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मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

वर्ण का वर्णन

मुझे हर जगह से सलाह मिल रही थी की ,काली दाल,चाय,चना सब बंद कर दो/बस  गिरी (सुखा नारियल ), दूध ,केसर,पनीर,दही  बस यहे ही खाना बाकि सब तुम्हारे और आने वाले बच्चे के लिए ख़राब है बहुत ख़राब है / में तो ख़ुशी के कारण पागल थी मेरी ससुराल वाले इतनी परवाह करते है मेरे जसे खुश किस्मत कोई नहीं / जो बोलते सब में ख़ुशी से पालन किये जा रही थी /सोचती थी , क्या हुआ कोई मेरे पास नहीं पर सब मेरा ध्यान तो रखते ही है /
अचानक एक दिन मेरी ननद ने फ़ोन किया कहाँ कोई काली चीज़ मत खाना वर्ना बच्चा काला होगा .....
तब मेरे दिमाग की घंटी बजी ,,अच्छा!! मेरी माँ, मेरी सासु माँ का यह सलाह  क्या थी.. मेरी सबसे पसंदीदा  काली दाल क्यों नहीं खाऊ .......
चलो मान  लो नहीं खायी दाल पर फिर भी काला हुआ तो ,,और होना भी चाहिए माता पिता का रंग नहीं आएगा तो किसका आएगा /वसे भी कौन से एशियन बच्चे गोरे चिटे होत्ते है बाहर पैदा होने से गोरे  का क्या मतलब..यह दुनिया भी न मेरा दिमाग खाली करके रहेगी ..दिल का रंग कोई भी हो पर चमड़ी  से गोरा होना चाहिए अजीब सोच है /
खेर दुनिया वाले मुझे बोलते थे तुम्हारा रंग दबा है (मैंने जान बुझ कर दबाया  है )लड़का देखने में तुम्हारी माँ को ..वसे तुम्हारे भाई बहिन तो गोरे ............अब इसमें भी दिक्कत .....पर मुझे जो एसा नहीं बोलता था उस पर आश्चर्य होता था ..आजकल पार्लर जाओ सब ठीक हो जाता है ..जिस दिन से मेरा रिश्ता हुआ उस दिन के बाद से में सबसे गुणवान सुन्दर सुशील लड़की हो गयी
खेर मैंने आज तक यह सब बात्तें सुनी ही है ...सब  मानी नहीं (कर्म ,भगवान की देना और किस्मत का कोई तोड़ नहीं  है ) मैंने सब खाया जो मन ने चाह जब चाह बस गैस नहीं होंनी चाहिए ../
मेरा बेटा हुआ ..सब खुश थे शायद बहुत खुश थे ...वो मेरे पति के जसा था उनका रंग दबा था ..जो पूछता कैसा   है मेरा जवाब होता-- बिलकुल अपने पापा पे गया है  इनकी कॉपी है जी ..बस फिर तो आवाज़ और शब्द निकलने बंद हो जाते :लोगो के कैसे  पूछे क्या रंग भी इन्ही पे गया है!!(मेरे तो हँसी से बल पड़ जाते )जब लोगो को फोटो भेजी तो जान में जान आई की गोरा है ...मुझे लगा हर बच्चा एसा ही होत्ता है इतना ही पिंक इतना ही मासूम इतना ही प्यारा ,चार दिन के बच्चे  को देख  यह बताना की माँ जैसा  या पिता हम दोनों के लिए बहुत मुश्किल था ..और मैंने  इतनी मेहनत की तो  में यही बोलती मेरे जैसा  है .
एक दिन मेरी माँ से रहा नहीं गया पूछ ही लिया क्या मौसी पे रंग गया है मैंने  कहाँ सब घर वालो के झलक मिलती है मैंने जान बुझ  कर किसी को बताया  ही नहीं..की असल रंग क्या है मैंने देखना चाहती थी कितना फर्क पड़ता है रंग का और कोई ऐसा  जाना नहीं था जिसने किसी न किसी तरह मुझसे यह पुछा  न हो  /
मेरी कोई दुश्मनी या जिद नहीं है रंग या ऐसा पूछने  वालो से, पर सब को सच मानाने का दम रखना चाहिए .
अगर आप बेटा कहते है  तो बोलो बेटा होगा मुझे ख़ुशी होगा क्यों भगवान बनाने की कोशिश करते हो !
 बोलो मनो की गोरा बच्चा होगा तो मेरी शान ज़यादा होगी! पर कोई यह नहीं मानेगा अच्छा तो अच्छा होता ही है ..पर एक बच्चा बुरा हो सकता ही या भद्दा हो सकता यह कसे कोई सोच सकता है मुझे नहीं लगता कोई सोचता है पर शायद सब एहसास करा देते है की तुम  काले हो लेकिन गोरे को भी वो एहसास करते है क्या वो बुरा मानता है !यह एहसास की तुम काले हो साथ में यह भी जोड़ देते है की वसे रंग से फर्क नहीं पड़ता (अच्छा अगर नहीं पड़ता तो आप इतना क्यों बता रहे है रंग के बारे  में ) गुण होंने चाहिए मन साफ़ होना चाहिए (गोरे लोग चलो काले हो जाओ वर्ना तुम्हारा मन काला है ) सोचिये अगर एसा होता तो क्या कभी negro लोग धरती पे होते सब जगह गोरे ही लोगो को रखना चाहिए /
यह एक मानसिकता है जो सोच के खोखले पन का एहसास कराती है  सुन्दर क पाता है वो सुन्दर है, काले को पाता ही वो काला है,  अंधे को पाता है वो अँधा है ,लूले को पाता है वो लूला है, गरीब को पाता है वो गरीब है  सब को सब पाता है किसी को तरह की नहीं अपनाने की ज़रूरत  है
 वसे अब मेरे बेटा का रंग माता पिता से मिलता जुलता है जिसकी मुझे खुशी है सच / मेरे लिए उसके कर्म का गोरा होना ज़यादा ज़रूरी है /
मज़ेदार बात यह की क्या में अपने पोते के लिए ऐसा  ही सोचुगी ? यह तो वक़्त बताएगा अगर में बदली तो अपनी पोस्ट में ज़रूर बताउंगी /

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