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शुक्रवार, 19 मार्च 2010

ख़िताब गृहणी और संतुलन

अपने सब्जी  के स्वाद को बढने के लिए संतुलन
पास पड़ोस के गप्पे न करने की कसक को  सब्जी के साथ भुनाया है
एक दुसरे को पाठ पड़ने के बजाये , बच्चो के पढाया है
सास बहु के षड्यंत्र बुनने के मन न लगा कर  सिलाई  कड़ाई में मन लगया है
किट्टी पार्टी और पार्लर भी जाती हु बच्चो को स्कूल भेज कर
घर के एक कोने कोने को रोज़ साफ कर मन हर सामान को करीने  से लगा कर
अच्छी गृहणी का ख़िताब पाया है
अपनी पहचान को के घर को  बनाया है
इसका आनंद हर कोई नहीं ले पाया है
नारी की सार्थकता के मायने नहीं समझये  जाते
वो घर स्वर्ग होता है जहाँ  नारी का सम्मान होता है
घर की धुरी माँ होत्ती है  वह कभी कमी नहीं होती
दुनियादारी का हिसाब वोही लगा सकती है
धरती को ऐसे ही माँ नहीं कहते //


हर संतुलित करने वाले चीज़ स्त्रीलिंग ही होती है /
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.