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बुधवार, 10 मार्च 2010

वतन की मिट्टी

अपने  देश  की रंगत का असर अब हुआ है ,जब में अपने वतन की मिट्टी से दूर हुआ हु
अपनी संस्कृति की गहरायी अब समझ आई है, जब परदेश में लोगो ने की बड़ाई है
आज दादी बाबा की त्योहार की रोनक का मतलब  समझ आया है
 मैंने  परदेश में हर  त्योहार  जोर शोर से मनाया  है
माँ बहिन के साथ चौक में कही  वो कथा , भाई के हाथ में राखी  और टिके की बहुत  याद आये
द्वार पर बनायी  अल्पना ,घर पे बने पकवान की महक ,सबको यहं समटने की कोशिश की है
मेरे देश के लोग यह छोड़ के विदेशी रंग में रंगने लगे
यह  अपनी संस्कृति का सम्मान  और दुसरे की संस्कृति से जुड़ना अच्छी  तरह जानते  है
क्यों नहीं यहं की कुछ अच्छाई बंध लू
जल्दी उठने और सोने की आदत को ,अच्छा खाना और मेहनत करने की आदत  को.
  अपने शारीर का सम्मान करने , सबको एक नज़र और  प्यार से बोलने की आदत को गले लगा लू .
रिश्तो  की पारदर्शिता को ,काम में ईमानदारी को ,हर काम खुद करने के मज़बूरी या चाहत को
 पता नहीं सब बुरी आदत क्यों अपनाते ज़रा देखे क्या है सचाई है
युही नहीं मेरे देश की बड़ाई है यहे माँ जनम दिया है अब परदेश में पल रहे है
कुछ तो फ़र्ज़ और क़र्ज़ का सम्बन्ध हो यही सोच हम चल रहे  है

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

सार्थक रचना...यह अच्छाईयाँ तो हमेशा काम आयेंगी.

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