मंगलवार, 9 मार्च 2010

शून्य हो जाती हु

शून्य हो जाती हु 
अपार खुशी के मिलने पर
असीम दुःख की परछायी से
 अपलावित सपनो के बिखरने  पर
 अबूझ जीवन की पहेली को सुलझाने के लिए
कभी अपने अस्तित्व को बचने  के लिए
यह  मेरे जीवन का संतुलन बना देता
मेरी परिधि का निर्धरण कर मुझे संबल देता
यह शून्य एक घेरा सा हो जा है
अपनी खुशियाँ की संभावना तलाशने में
दुःख की गांठे कम हो जाती
अँधेरे से उजाले की और खीच ले जाता
असंख्य काँटों को परिभाषित कर जीवन का पाठ पढ़ा जाता यह शून्य
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