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बुधवार, 3 मार्च 2010

कुछ शब्द

ख़ामोशी में शब्द  की तलाश में गोते खा रहा होता है यह  मन
कभी कुछ शब्द कम पड़ जाते है कभी एक लव्ज़ सब कह देता है
कुछ भवर में फसे पुराने शब्द का मायने समझता है
 खो गए है कुछ लव्ज़ को ढूंढ़ कर रख जाता है
कभी बरबस दो आंसू लुढक जाते है
कभी एक शब्द से जुडी याद ताज़ा हो आती है
कभी न रुकने वाली जबान ,कान के लिए तरस जाती है
कभी कान एक जबान के लिए
खुद से बात करने का पागलपन करवा देता है शब्द का सेलाब
यह ख़ामोशी  भी अपनी सी लगने लगती है

1 टिप्पणी:

कमलेश शर्मा ने कहा…

बहुत खूब, शब्‍द का मर्म

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