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मंगलवार, 9 मार्च 2010

America

America में  रहना  है  असं  नहीं
 कभी बिमा  कभी कस्टम ने वाट लगाये
रोज़ नए नए काएदे  आये
घुमने की सोचते ही बड़े  बड़े  टिकेट के पैसे याद आते
सबको बस यहं के डालर  नज़र आते, क्यों नहीं उनको यहं के बिल थमते
कोई जगह नहीं दुनिया में जहाँ मेहनत  के बिना कुछ मिल जाता
मेरा पति सुबह जा कर  शाम को आता
१0 से ज़यादा  बिल दे दे कर आधी  तनख्व गवाता
आधी देश भिजवाता
दूर देश सब आस लगे पैसे शायद बक्से में भर लाते
 नहीं समझ आता की जितना पैसा उतनी महगाई
ज़रा सी चोट से आधे महीने  की  पगार गवई
कोई नहीं कहने को मेरा
अकेलेपन  के दर्द से उबार न पाई
सब को बस चकाचोंध  है दिखती
पीछे की  तन्हाई कोई नहीं समझ  पाए
अपने ही लोग करे परायी मेरा बच्चे परदेश में है 
बस बक्से भर पैसे देते जाये और यहं कभी न आये
हम यह बोल के रोब जामये अपने सामान की बड़ी बड़ी लिस्ट भिजवाए //
इसी बहाने हम भी घूम आये
अपना देश अपने लोग पराये लगते है
पराया देश अपना सा लगता है

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