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बुधवार, 31 मार्च 2010

दो पल

ज़रा दो पल ठहर  जाते
हम अपने मन की बात तुमको बताते
कितनी चाह थी रोक ले तुम्हे
पर जाने की जल्दी ने
और बेरुखी से हम अन्दर तक सुलग गए
यु तो इन तोफहा  की चाह  नहीं
 इनमे छुपे प्यार को शिदत से महसूस करते है
तुम्हारी गेरहाजारी में अपनी किस्मत पर इतराते  है
एक तुम ही तो हो जो हमारी बचकानी बाते  झेल पाते  हो
कभी अपनी नादानियों पे हम शरमाते है
तुम्हारे आलिंगन  में जितना सुकून है वो धरती के किसे कोने में नहीं है
हमारी गुस्ताखियों को भी तुम माफ़ कर देते हो
तुमसे ही हमारी शान है सिर्फ तुम्हारा ही अरमान है
हर ख़ुशी दे पाए जिसे तुमने चाह है
तुम्हारे प्यार के सामने मेरी हर चीज़ कम है
हम शुक्रगुज़ार है की रब ने तुम्हारे प्यार के लिए हमे चुना
कितने ही लव्ज कहे वो कम है

मोह

आज सब चीजो  से मोह सा भंग हो गया
इतनी सुविधा पाने के लिए जी जान लगायी थी
दोस्तों के साथ जोश से हमेशा एक से रहने की कसम खायी थी 
आज कितने बदल गए हम ,जीवन की आपाधापी में खो गयी वो मटर गस्ती
तेरा मेरे के दरिया में इतना डूब गए हर सामान से लेकर सस्य्रल तक के लोगो को नहीं छोड़ा   
सब के पास सब कुछ : बस नहीं है तो वो नज़रिया
जो कभी हमेशा लुटने के बात करते थे ,आज जोड़ने  की करने लगे है 
 एक अंधी दौड़  में लगे है आज को  सुकून  से जी लो ,
पर इस मन पे नहीं है किसी  का काबू
जलन इर्षा से भर जाता है जब कोई अच्छा सामान  ले आता  है
या promotion का लैटर दिख जाता है
अगर विदेश का ट्रिप लग जाये तो नश्तर  चुभ जाते है
उलटे मंत्र पड़ने को आते है टोने टोटके से नहीं घबराते
हलकी सी छीक आने पर भी लोगो की नज़र का दोष बताते
लोगो की काबिलियत  नहीं  उसका रुतबा देखिये
तन  मन से देशी पर विदेशी की छाया का कमाल
सुट बूट टाई चश्मा के साथ atitudeका कमाल 
चाय में बिस्कुइत डुबो कर नहीं कुतर कर खायेंगे
ऐसे पोलिश लोगो को क्या बुलवायेंगे
इस जमने का नशा ही एसा है अप्प भी कही घूम हो जायेंगे 

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

ख़िताब गृहणी और संतुलन

अपने सब्जी  के स्वाद को बढने के लिए संतुलन
पास पड़ोस के गप्पे न करने की कसक को  सब्जी के साथ भुनाया है
एक दुसरे को पाठ पड़ने के बजाये , बच्चो के पढाया है
सास बहु के षड्यंत्र बुनने के मन न लगा कर  सिलाई  कड़ाई में मन लगया है
किट्टी पार्टी और पार्लर भी जाती हु बच्चो को स्कूल भेज कर
घर के एक कोने कोने को रोज़ साफ कर मन हर सामान को करीने  से लगा कर
अच्छी गृहणी का ख़िताब पाया है
अपनी पहचान को के घर को  बनाया है
इसका आनंद हर कोई नहीं ले पाया है
नारी की सार्थकता के मायने नहीं समझये  जाते
वो घर स्वर्ग होता है जहाँ  नारी का सम्मान होता है
घर की धुरी माँ होत्ती है  वह कभी कमी नहीं होती
दुनियादारी का हिसाब वोही लगा सकती है
धरती को ऐसे ही माँ नहीं कहते //


हर संतुलित करने वाले चीज़ स्त्रीलिंग ही होती है /

मेरा बच्चा मेरे अरमान

एक अस है एक विश्वास  है
मेरा बेटा अच्छा इन्सान बनेगा
हर काम को सम्पुर्ण कर अंजाम देगा
अपने लक्ष्य को पा कर रहेगा
साथ ही  अपनी सभ्यता  और  संस्कृति
का सम्मान करेगा
दूर नहीं कोई राह उसके लिए
सिर्फ चाह तक पहुँचाना है
अभी वो चलना नहीं सिखा
मेरी उम्मीद ने उड़ना  शरू कर दिया
मेरे असंख्य अरमान ने जनम लेना शरू कर दिया //

 लालन पालन समावेश है
प्यार बहुत पर बिगाड़ने  के लिए नहीं
अरमान है पर थोपे के लिये  नहीं
जीवन का पाठ किसने बेठ कर सिखाया  है
हर बच्चा खुद ही समझदार बन कर आया है
कल हम अपने माता पिता को सीख देते थे
आने वाले कल हमे सीख मिलेगी
जीवन ने ही सबको हर कुछ सिखलाया है
पर यह बेकाबू मन को  अरमान बुनने से कौन रोक पाया है  /

बुधवार, 10 मार्च 2010

Date Date

मैंने अपने बेटे को आज Date  लिखना सिखाना चाह

मैंने बोला आज की  Date  लिखो बेटा
बेटा   -में आज Date  पे नहीं गया
में   --अरे, तुझे आज की Date  नहीं पता?
बेटा- मुझे तो रामू ,संजय,कारन,आदित्य और सुमीत की Date पता है
में  -मुझे लगा उनकी जन्मतिथि की बात कर राह है -बेटा आज की Date  लिख तेरी जनम Date  नहीं
बेटा -अरे वो जनम दिन पर तो मैंने इन सब को बुलाया था वो अकेले थोड़ी आते उनके साथ Date  आये थी और उससे मेरा रुतबा बना
में -रुतबा ?कैसा रुतबा ?
बेटा -माँ ,आप  छोड़ो में आप को नहीं समझा सकता
में --अरे तू क्या समझाएगा  में बाता  रही हु अभी तो बस ५ साल का है तू  ,आज की Date  तो लिख नहीं पा राह
बेटा -पापा ,आप  माँ को बोलो
पापा-तुम्हे नहीं पता Date  का मतलब ,गर्ल फ्रेंड के साथ घूमना
में -हाय ! तुम भी बच्चो  के सामने कैसी  बातें करते हो ?
बेटा -माँ ,मुझे यहे सब पता है आप out Date  हो  गयी  हो 

वतन की मिट्टी

अपने  देश  की रंगत का असर अब हुआ है ,जब में अपने वतन की मिट्टी से दूर हुआ हु
अपनी संस्कृति की गहरायी अब समझ आई है, जब परदेश में लोगो ने की बड़ाई है
आज दादी बाबा की त्योहार की रोनक का मतलब  समझ आया है
 मैंने  परदेश में हर  त्योहार  जोर शोर से मनाया  है
माँ बहिन के साथ चौक में कही  वो कथा , भाई के हाथ में राखी  और टिके की बहुत  याद आये
द्वार पर बनायी  अल्पना ,घर पे बने पकवान की महक ,सबको यहं समटने की कोशिश की है
मेरे देश के लोग यह छोड़ के विदेशी रंग में रंगने लगे
यह  अपनी संस्कृति का सम्मान  और दुसरे की संस्कृति से जुड़ना अच्छी  तरह जानते  है
क्यों नहीं यहं की कुछ अच्छाई बंध लू
जल्दी उठने और सोने की आदत को ,अच्छा खाना और मेहनत करने की आदत  को.
  अपने शारीर का सम्मान करने , सबको एक नज़र और  प्यार से बोलने की आदत को गले लगा लू .
रिश्तो  की पारदर्शिता को ,काम में ईमानदारी को ,हर काम खुद करने के मज़बूरी या चाहत को
 पता नहीं सब बुरी आदत क्यों अपनाते ज़रा देखे क्या है सचाई है
युही नहीं मेरे देश की बड़ाई है यहे माँ जनम दिया है अब परदेश में पल रहे है
कुछ तो फ़र्ज़ और क़र्ज़ का सम्बन्ध हो यही सोच हम चल रहे  है

मंगलवार, 9 मार्च 2010

America

America में  रहना  है  असं  नहीं
 कभी बिमा  कभी कस्टम ने वाट लगाये
रोज़ नए नए काएदे  आये
घुमने की सोचते ही बड़े  बड़े  टिकेट के पैसे याद आते
सबको बस यहं के डालर  नज़र आते, क्यों नहीं उनको यहं के बिल थमते
कोई जगह नहीं दुनिया में जहाँ मेहनत  के बिना कुछ मिल जाता
मेरा पति सुबह जा कर  शाम को आता
१0 से ज़यादा  बिल दे दे कर आधी  तनख्व गवाता
आधी देश भिजवाता
दूर देश सब आस लगे पैसे शायद बक्से में भर लाते
 नहीं समझ आता की जितना पैसा उतनी महगाई
ज़रा सी चोट से आधे महीने  की  पगार गवई
कोई नहीं कहने को मेरा
अकेलेपन  के दर्द से उबार न पाई
सब को बस चकाचोंध  है दिखती
पीछे की  तन्हाई कोई नहीं समझ  पाए
अपने ही लोग करे परायी मेरा बच्चे परदेश में है 
बस बक्से भर पैसे देते जाये और यहं कभी न आये
हम यह बोल के रोब जामये अपने सामान की बड़ी बड़ी लिस्ट भिजवाए //
इसी बहाने हम भी घूम आये
अपना देश अपने लोग पराये लगते है
पराया देश अपना सा लगता है

शून्य हो जाती हु

शून्य हो जाती हु 
अपार खुशी के मिलने पर
असीम दुःख की परछायी से
 अपलावित सपनो के बिखरने  पर
 अबूझ जीवन की पहेली को सुलझाने के लिए
कभी अपने अस्तित्व को बचने  के लिए
यह  मेरे जीवन का संतुलन बना देता
मेरी परिधि का निर्धरण कर मुझे संबल देता
यह शून्य एक घेरा सा हो जा है
अपनी खुशियाँ की संभावना तलाशने में
दुःख की गांठे कम हो जाती
अँधेरे से उजाले की और खीच ले जाता
असंख्य काँटों को परिभाषित कर जीवन का पाठ पढ़ा जाता यह शून्य

सोमवार, 8 मार्च 2010

अगर तुम समझे होते

मेरी मोहबत  को अगर तुम समझे होते
तो यु न दर किनार किया होता 
मेरी आँखों की गहरायी  में तुम्हारा अक्स को जाना होता
कभी एक प्यार की नज़र से देखा होता
माना तुमने बहुत गम का  दरिया देखा है
एक बार मेरे मन को पढ़ा  के देखा होता
तुम्हारे हर दुःख को लेना चाहती हु
एक मौका तो दिया होता
अगर निराश करती तो अपना मुख  न दिखाती 
कभी कभी कोई मिलता है  दुनिया में
जिससे मन मिल पाता  है
बेगाना होता तो क्यों अपना मन लगता
और भी बहुत काम है इस दुनिया में मोहबत के सिवाय
सनम हम भी तुमसे  है बहुत सतये

बुधवार, 3 मार्च 2010

कुछ शब्द

ख़ामोशी में शब्द  की तलाश में गोते खा रहा होता है यह  मन
कभी कुछ शब्द कम पड़ जाते है कभी एक लव्ज़ सब कह देता है
कुछ भवर में फसे पुराने शब्द का मायने समझता है
 खो गए है कुछ लव्ज़ को ढूंढ़ कर रख जाता है
कभी बरबस दो आंसू लुढक जाते है
कभी एक शब्द से जुडी याद ताज़ा हो आती है
कभी न रुकने वाली जबान ,कान के लिए तरस जाती है
कभी कान एक जबान के लिए
खुद से बात करने का पागलपन करवा देता है शब्द का सेलाब
यह ख़ामोशी  भी अपनी सी लगने लगती है
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.