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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

आत्मग्लानी

आज पिताजी की हालत देख कर मेरा मन रो राह है .......कभी  पापा को इतना रोते हुए नहीं देखा .आज इस पड़ाव पर वो अपने आप को रोक नहीं पा रहे है  ..वो अपने आप से लड़ रहे थे किसी बात को मुझे बताना चाहते है ..हालाँकि में उनकी बहुत प्यारी बेटी नहीं हु...... न  ही  उनके बहुत करीब रही पर ......वो मुझ पर बहुत  भरोसा  करते है ..मेरे प्यार को उनके लिए समझने के लिए शब्द की ज़रूरत नहीं है . आज पूरा दिन इंतज़ार कर रही थी....... शायद मुझे बुलाएँगे . और रात को मेरा इतंजार ख़तम हुआ  ...मुझे अपने कमरे में बुलाया और थोड़ी देर अपने आप से अपने विचारो से  लड़ते रहे.. मैंने पिताजी के कंधे पर हाथ रखा और वो एक छोटे बच्चे की तरह बिलख  पड़े ......मैंने  पापा को हमेशा एक बहुत ही मजबूत थोडा गुस्सेल और अपने मन की करने वाले इन्सान की तरह देखा है ..वो कभी अपने आप को कमज़ोर और साधारण नहीं  दिखा पाते थे .......उनके रहने का अंदाज़ किसी महाराजा  की तरह था .पर उनका चिलना और बिना बात के माँ पर हमेशा गुस्सा करना ........मुझे समझ नहीं आता  था..शायद माँ उनको समझ नहीं पाए या वो माँ को या दादा दादी उनके रिश्ते की कड़ी थे या रुकावट यह  में कभी नहीं समझ पाई  ...पिताजी की नौकरी न करने की जिद और हम भाई बहनों का लगातार बढना ....दादाजी की ज़िम्मेदारी बढा राह था पिताजी ने आज तक कभी हम भाई बहनों के सर पे हाथ नहीं रखा न कभी प्यार से देखा हम उनके लिए कुछ नहीं थे / पिताजी  की इतनी दहशत  थी की उनका कोई सामान नहीं छूता  था........ अगर छू दे उनके गुस्से का शिकार होता था ...उनको हमारी पढाई  की कोई चिंता नहीं थी.......... सिर्फ दादाजी के कारण हम लोग पढ़ा  पाए वर्ना आज कहीं गली में घूम रहे होते पर पिताजी बहुत किस्मत वाले थे /उनके पिताजी ने उनकी उनके बच्चे यानि हम लोगो की पूरी जिम्मेदारी  उठा रखी थी / दादाजी के बाद बड़े  भाई  ने बहुत जिमेदारी से सारे  काम किये पिताजी बस अपने  नए  बिसनेस के साथ एक लोन
का बोझ बन गए थे / किसी  बहिन की शादी की चिंता नहीं थी ..पर हम सब बहने सुन्दर थी और पढ़ी  लिखी थी इसलिए हमारी शादी में कोई दिकत नहीं आये ..बस  बड़ी दीदी की देर से हुए बाकि सब की जल्दी जल्दी करवा दी दीदी और भैया ने सब संभल लिया/ पिताजी ने न तो जिम्मेदारी समझी न कुछ  किया बस भरी  महफ़िल में माँ पर चिल्ला  दिए  और हमारे घर को एक बार फिर नीचा दिखना पड़ा ...... वसे हम सब भैये बहनों की नौकरी लगने के बाद .......लोग हमे कुछ पूछते थे वर्ना  कुछ नहीं समझते थे सब डरते  थे.. हम गए तो  उनका कुछ ले न ले .......पर गरीबी के साथ हम सब को बहुत सम्मान दिया था..... भगवान ने कभी किसी की चीज़ पर बुरी नज़र नहीं डाली न ही चाहत तो होती थी/ की पहला चीज़ हमारे पास हो पर कभी उसकी तरफ चुराने  या मागने के बात दिमाग में नहीं आई.......पर एक अजीब से नज़र का सामना करता पड़ता था हमे और यह गलत नहीं पिताजी की वजह से ...पिताजी के करना जो था वो माँ को भी झेलना  पड़ता था वो हमेशा  माँ पर गुस्सा करते रहते थे अगर वो दादी के संरक्षण में नहीं होती तो शायद ...पर माँ इतनी मजबूत नहीं थी उन्होंने  भी उतना प्यार नहीं दिया  बस दादी के प्यार से हम आगे बढे.......... हमेशा कोई न कोई किसे के लिए होता है यह सच है /
शायद इन्सान जाते समय अपने आप अपना लेखा जोखा का हिसाब लगता है आज पिताजी भी लगते है
पिछले १० साल में पिताजी में बहुत बदलाव  आया है  भाभी का आना और खुद किसी के लिए कुछ न कर पाना ..हालाँकि मुझे ऐसा नहीं  लगता की पापा को इस बात का कोई दुःख हो पर अब लग राह है ..वो अपने बच्चो को प्यार करते थे उनको पैदा करके छोड़ दिया ऐसा नहीं था /
मेरे हाथ पकड़ कर बोले "बेटा मैंने कभी किसी  के लिए  कुछ नहीं किया बस अपने लिए जिया और अब मर जाऊंगा........... बिना किसी का भला किये कभी तुम लोगो के  सर पे हाथ नहीं रख...... कभी तुम्हारी पीठ नहीं थप थापयिए ...बाउजी और तुम सब को बहुत दुःख दिया /तुमने मुझे फिर भी एक पिता का दर्ज दिया इसकेलिए मैंने ज़िन्दगी भर तुम्हारा आभार मानुगा हो सके तो मुझे माफ़ करना/ मैंने बहुत खुश किस्मत हु की मुझे तुम्हारे जसे बच्चे मिले और पिता मिले   " मैंने जितना उन्हें शांत करने की कोशिश करी उतने ही बैचेन हो जाते
पर आज उनकी आत्मग्लानी की मायने कुछ नहीं थे... वो अपना दर्द न ले जाये यहे उनके लिए ठीक है ......इसलिए  आज में प्रार्थना  कर रही थी उनका दर्द आंसू और शब्द  में बह जाये और आत्मग्लानी से मुक्त हो /

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

आपने अपना कर्तव्य किया..आपने सही प्रार्थना की.

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