सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

मन के दंश

थक गयी हु अपनी तन्हायी से,उब गयी हु अपनी परछायी  से
कभी किसी से शिकवा न किया,आज  उसका खामियाजा मिला
कोई  नहीं है कहने को मेरा
मेरी ख़ामोशी, सब को खुश रखने की कोशिश
पे सवाल उठ खड़ा हुआ
खो गयी हु भीड़ में ज़िन्दगी की आपा  धापी में
अपने निशान छोड़ने की सोच था खुद ही मिट गयी हु
अपने अस्तित्व की तलाश में राह भटक गयी
सब को खुश करने में अपनी साख मिट गयी
आज कुछ हाथ नहीं बस एक बोल सुनाने को मिलता है
तू नहीं तो कोई और होता जो किया सब करते है
सिर्फ मन मसोस कर रह जाती हु
कभी नहीं किया जो चाह था
माँ बाप की  शादी तक की पाबन्दी ,
पति का काबिलियत पे सवाल
मेरी दिल की गहरायी तक हिल गयी इन सब  से
अकेले में सिर्फ आंसू बहा सकती हु किसी को मन के दंश के बारे  में नहीं बता सकती हु
कितनी तनहा हु इस जीवन में
अब सोचती हु बेटा क्या बोलेगा आगे चल कर
एक औरत के भाग्य और विधाता के न्याय के बीच में  हु
कभी अपनी परीक्षा तो कभी अपनी काबिलियत की परीक्षा दे रही हु
सोचती हु जो काबिलियत  की परीक्षा अच्छी होती है वो कौन से दंभ से आगे चलती है
कभी आसमा को चुने का जस्बा रखने वाली में आज ज़मी की सच्ची से दूर भागना चाहती हु
अपनी परछायी को पति  के अक्स में देखने की चाहत अधूरी लिया चली जाना ही होगा .
कुछ कर्त्तव्य के लिए खुद को मिटना ही होगा
सब  और अधुरा है इस दुनिया में अब मेरे लिए बहुत नहीं है यहे गुलिस्ता
शायद मुझे ही अपना पक्ष रखना न आया
इसलिए इस जहन  ने ठुकराया
लड़ा रही हु तन्हायी से एक साथ के लिया
आज उस साथ के बाद भी तनहा हु
कुछ बहुत नहीं माँगा था बस मेरे लिए वक़्त और  थोडा सा प्यार माँगा था
मेरी तमन्ना का सहारा   माँगा था आज मजबूर लाचार की  कतार में खड़ी हु .
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