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बुधवार, 20 जनवरी 2010

सफल गृहणी

खो गयी शब्दों के धार,नहीं हो रह अच्छे वार
कोई कविता कहानी या नज़म नहीं बना  पाए
लगता है  recession की मार  मेरी लेखनी ने खायी
या इस उम्र का तकाजा है जिसमे  तजुर्ब तो बढ़ा है लव्ज़  कम हो गए
कलम उठाते ही उठ तो जाती है पर चल नहीं पाती
जब खाली  पन्ना दूर होता है तो दिमाग उम्दा सोच से  कविता बना डालता है
जसे ही पन्ना मिलता है विचार गुम हो जाता है
अजब  पहेली  बन गयी है लेखनी
अरे अब याद आया में कविता पकने रख आई  हु जल्दी ही बन जाएगी
खाने का स्वाद तो बढ़ा गया है अपनी सोच का दायरा सिमट गया है
जीवन की  उलझने इतनी है की अपनी पसंद ही भूल गयी हु
या में एक सफल गृहणी हो गयी हु .

3 टिप्‍पणियां:

ह्रदय पुष्प ने कहा…

खाने का स्वाद तो बढ़ा गया है अपनी सोच का दायरा सिमट गया है
जीवन की उलझने इतनी है की अपनी पसंद ही भूल गयी हु
या में एक सफल गृहणी हो गयी हु .
वाह वाह - खाना और कविता तालमेल ना होते हुए भी आपने बिठा ही दिया - अच्छा लगा.

संगीता पुरी ने कहा…

गृहिणी की इसी उधेडबुन में ही तो उसकी सफलता छुपी हुई है !!

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छी अभिव्‍यक्ति दी है आपने अपने विचारों को .. बधाई !!

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