संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

रविवार, 3 जनवरी 2010

समझोता

 रामा क्या सोच रही है ?
कुछ नहीं सुनीता ..
बताना ...कुछ दिन से परेशां दिख रही है अरविन्द  से  झगडा हुआ क्या ?
नहीं ..........
नहीं ..फिर क्या हुआ .......
कुछ नहीं समझ नहीं आता ......
क्या ..?
यही की क्या हर पति पत्नी एक दुसरे के पूरक होते है
हाँ होते है
अच्छा तू और वरुण हो ?
हाँ ..
फिर लड़ाई
वो तो सबकी होत्ती है
अच्छा ..
रामा जो पूछना चाहती है वो साफ़ साफ़ पूछ
कुछ नहीं .........
अरे .......वसे पी पत्नी का रिश्ता ही कुछ एसा होता है ..
कैसा..................?
 पल में तोष पल में माशा ...
मतलब............
मतलब यही की दोनों एक दुसरे के साथ सबसे अच्छे और सबसे बुरे होते है ...वो सिर्फ इसलिए क्योंकि २४ घंटे १२ महीन साथ रहते है दोनों एकदूसरे को इतना समझते है की यहे भी पता होता है क्या अच्छा लगता है क्या बुरा ....और जब जैसा  पल आता  है वसे हो जाते है ....
फिर लोग अलग क्यों होते है?
इसलिए ..क्योंकि बहुत बार हर रिश्ते में ऐसे मोड़ आते है जहाँ थोडा चुप रहन होता है या बात को टालना होता है नहीं तो बतंगड़  बन जाता ..........वसे भी यहे बात जगजाहिर है की  पति की इज्ज़त  आप  से और आप की पति से..अलग होने पर सिर्फ इनको फर्क पड़ता है और किसको नहीं न माँ बाप न बही बहिन अगर बच्चे छोटे है तो उन्हें पड़ता है वर्ना किसे को नहीं
सही बात है .......
क्या हाँ में हाँ मिला रही है फिलोस्पेर सी .....कोई प्रॉब्लम हो तो बोल
नहीं कुछ नहीं
वसे भी यहे रिश्ता बहुत नाजुक  होता है ....और पूर्ण तो कोई भी नहीं होता हर जाने का रहने खाने का तरीका अलग होता है ...और फिर दोनों एकदम अलग माहौल से आते है एकदूसरे को समझे में समय तो लगेगा ....
सुनी अरविन्द थोड़े अलग है ...
मतलब ..
वो हमेशा दोस्तों घरवालो इन सब के बारे में सोचते रहते है इनको तवाजो देते है ...........में जो भी बोलती हु वो सुनते ही नहीं है बल्कि उस पर मुझसे बहस करते है ........और वोही काम दूसरा जना  करे तो उसकी बड़ाई करते है ....तू जानती है मैंने शादी से पहेले कभी खाना नहीं बनाया अब मैंने सब बनाती हु और .......
अच्छा भी रामा
पता नहीं कभी तारीफ के दो बोल नहीं फूटे और सब के सामने तो कभी नहीं .........जब हम कहीं और जाते है तो इतनी तारीफ करते है चाहे  कैसा  भी खाना बना हो......जो इन्सान जो काम नहीं कर सकता वो कभी नहीं कर सकता ........पर हमेशा मेरा और मेरे घर वालो  से सम्बंधित  बात पर तो हम लड़ाई से ही  करते है
वो तो सबकी होती है..रामा
 हर बात पर ........
नहीं पर ...अगर दोनों परिवार का स्तर अलग है तो पक्का बड़ी लड़ाई होगी
हाँ सुनी यहे सही है ...
पर रामा अरविन्द बहुत अच्छे है
हाँ बहुत अच्छे है ..पर मेरे साथ उनका व्यव्हार समझ नहीं पाती
क्यों .....?
वो   कभी मुझे मदद नहीं करते जब ज़रूरत होती है ........जसे कोई आने वाल है या आ गया है तो इतना मशगुल  हो जाते है की ..............मैंने बीमार होते हुए भी सारा काम खुद किया है अरविन्द  हाथ तक नहीं लगते यहं तक की खुद खुद के बर्तन तक नहीं रखते जबकि अरविन्द के सारे दोस्त मदद करते है और दूसरो के यहं जाके मदद करवाते है ....कुछ बोलने पर बोलते है में जोरू का गुलाम  नहीं......अगर
 मेरे हाथ का बना सामान रखु तो मजाक बनाते है सब के सामने ...खुद की कोई पसंद नहीं न ही मेरा नोवेल पड़ना ,पेंटिंग करना का कुछ और पसंद है बल्कि हमेशा कमियां निकलते  है...मैंने अरव के होने पर सारा काम किया के अगले दिन से खुद किया सब को दिखने के  लिए छुटी तो  ली पर अगर पानी मांग तो आहा उह करने लगते थे    अरे .......
वोई न वसे मुझे कोई मदद नहीं चाहिए लेकिन ...जब में बीमार हु तो न खुद खाना खाते है न मुझे पूछते है .......कोई टोइलेट साफ़ नहीं कोई वचूम नहीं अपना टेबल तक साफ़ नहीं करते शवे करके इतना गन्दा करते है वाशबेसिन कितनी बार बोला पर इतने जिद है की बस .............साफ़ नहीं करके देते ......दिन भर नाक में हाथ .........छी
हर आदमी ऐसे गंदे  ही होते है
पता नहीं........
नहीं हम लू को सफाई का ज़यादा ख्याल होता है
पर सुनी में यहे नहीं बोलती की यही करो पर समय के साथ बदला ज़रूरत है आर आपके लिए ठीक है तो उसमे अहम्  दिखने की क्या ज़रूरत है .....अप्प सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहते की वो आपकी पत्नी बोल रही है तो यहे गलत है
हाँ तू ठीक  है रामा ........पर शादी एक समझोता होता है यहे माना ले ...तो तेरे लिए काफी असं हो जायेगा सब ....इसमें अगर हर बात को एहमियत देगी तो दिकात तुझे ही होगी .......आज भी हमारा समाज इतना नहीं बड़ा है की यहे सवाल जवाब सेहन कर पाए .....और सबसे बड़ी बात अल होके हम भी खश नहीं रह पते आखिर पति पत्नी का रिश्ता इतना कच्चा भी नहीं होता .....समझोता तो हम माता पिता के घर भी करते ही है .........नहीं तो हर जाना बिल गयेस का बच्चा बनाना चाहता है ........तू एक दिन भी अरविन्द के बिना नहीं रह सकती
हाँ में नहीं रह सकती क्योंकि वो बहुत अच्छा इन्सान है .........
और हो सकता है की अरविन्द को लगता हो तू उसकी आज़ादी में एक रोड़ा है
हाँ होगा ही ................पर करीने से रहने में क्या दिक्कत है क्या गलत है
सब प्यार से करवा और वक़्त के साथ सब होगा ................और अच्छा ही होता है .........वर्ना आज शादी की इतनी ज़रूरत नहीं होती वसे भी अगर आदमी में खाने पीने और आवारा गुण न हो और इस कलयुग में क्या चहिये
सही है सुनी किसी भी बात की परते खोल दो और निष्पक्ष हो जाओ तो कितनी आसान   हो जाती है वर्ना एसा लगता है कितना मुश्किल है  साथ निभाना
फिर तो कोई भी दोस्त सहेली और बहिन कोई नहीं होता सब अलग  अलग होते ...

कोई टिप्पणी नहीं: