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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

मायका

गज़ब खुशबु होत्ती है बचपन की पचपन तक ताज़ा  रहती है
सिंदूर की लकीर से पल में परे कर दिया जाता
पर दिल में छिपी याद को कोई नहीं जला पाया
माँ पर की हुकूमत , पिता पर जमाया रोब
भाई बहिन की लाडली होती  जाती
 पल रूठ जाती सारी ख्वाइश पुरी होत्ती
बड़े अरमान से एक डोली उठती है
सब के आशीर्वाद से उसकी सामान में बसी होत्ती
गहनों से प्यार नहीं कपड़ो का लालच नहीं
बस माता पिता के प्यार की खुशबू का ख्याल है
उनके आशीर्वाद से नए जीवन को महकाना  चाहते है
ससुराल में मायके की खुशबू  बरक़रार रखना चाहते है

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

दो दिल

बहुत से साल बीत जाते है एक दुसरे के साथ
कभी दो दिल मिल कर नदी बन जाते
कभी दोनों दिल के छोर सागर से भी दूर हो जाते
साथ यह   जीवन इतना असं नहीं होता
सबका अपनी धरती और अपने असमा पे  अधिकार  होता
कभी अकेले रह कर भी साथ होते है कभी साथ होकर भी  तनहा
बहुत नाजुक डोर है दिल से  दिल की
ज़यादा  ढील दे दो तो छुट जाती
कसा पकड़ते ही दम निकल जाता
रख देने पर उलझ जाती है
छोड़ देने पर ग़ुम जाते  है
फिर से तनहा दो दिल भटक जाते है

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

साल भर खुशियाँ

साल  भर  का  बेटा  मेरा
अपार ख़ुशी से भिगो गया वो पल
आचल में  खुशियाँ   बिखर  गयी  है
कभी  उसकी मुस्कान मुझे हसती
कभी उसके रोने से में रो जाती
उसकी हर बड़ी छोटी चाहत अच्छी लागती
चलना पलटना खाना रोना नयी नयी  चीज़े सीखना
मुझे लगन का  पाठ पड़ा गया  बच्चा
बार बार गिरत फिर उठ जाता
उसी उत्साह से फिर चल पड़ता
मुश्किल है बच्चो की परवरिश
प्यार और डांट का एक समीकरण है
उसकी पहला रोना आज भी ताज़ा है मेरे मन में

dutiful और beautiful है बच्चे का आना
देर  रात तक उठाना कभी इतना थक जाना
फिर भी खुबसूरत है बच्चे का आना
कभी बाल  भी नहीं बना पाती फिर भी कभी खाना नहीं खा पाती
कभी ग़ुम नहीं पाती बड़ा ही प्यारा है यह रिश्ता
सब दे कर बहुत कुछ मिल जाता है
कोई माँ अपने को सपूर्ण नहीं मानती
 हर बच्चे के लिए माँ सबसे बेस्ट होत्ती

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

बहु










बहु को कोई कभी  अपना न पाया
जो बात करे वो किसको न भयी (पसंद आये )
अजब रीत है हर सास बहु होती फिर भी अपना वक्त भूल जाती
घाट घाट का पानी पे कर भी वही पस्त हो जाती है
बहु का कोई सुख नहीं अच्छा लगता
इतनी उम्मीद करते है पर उसकी इच्छा का कोई मान नहीं
बहु को कभी बेटी न बना पाते
अपने अस्तित्त्व को घुलता देख पिगलती बहु एक दिन फिर सास रूप में आ जाती है
कल में भी वही  सास होंगी ...................
बहु बेटे का खर्चा करती पर बचत की भागीदार भी तो होती
यही कम खर्चा  करना होत्ता क्यों बेटे को घोड़ी चदते?
बहु घर के सब का करे ,सब का सम्मान करे
हर सदस्य के फर्मयिएश पूरी करे
पर उसकी छोटी सी चाहत नहीं पूरी  कर पाते
न बुरी नज़र डालो उसके गहने पर कपडे पर
उसके माता पिता का आशीर्वाद है उसमे
नया घर नया रूप है नारी उसका सम्मान करे
अपेक्षा इतनी न हो की उसका दम घुट   जाये
न इतना भेद भाव की दिल को चुभ  जाये
इतना असं नहीं पर इतना मुश्किल भी नहीं
वो भी सास होगी...... इसका एहसास  है उसे भी
 बेटा नहीं बदलती घर को संभालती है
अपने पंख को समाज के बंधन के कारन  नहीं खोल  पाई थी वो खोलना चाहती है
ज़रा प्यार और सम्मान देके देखो
अपेक्षा  के स्तर को कम करके देखो
परिवार का अंग बनके देखो
खुद  बा खुद परिवार में घुल जायगी ...

शनिवार, 20 नवंबर 2010

तुम्हारा साथ खलने लगता है

आज पैसा ,कल का आराम
कितना  पैसा , कैसा  आराम
हर एक मुकाम के बाद सब कम पड़ जाता है
छोटी छोटी खुश्यिओं पे रोक लगाके बड़े आराम की चीज़ तो आ जाती है
पर वो आराम का मुकाम निकल जाता जाता है
बच्चो के साथ बिताये वो पल जो उनके ज़ेहन में सदियों तक रहते है
वो खोके  चंद  पैसे भी किस काम के
अपने जीवन में  बच्चे  को जायदाद न दे कर अपना समय दे दो
बार बार भीख  मांग रही हु  साथ घुमने और थोड़ी से बात करने का समय दे दो
बुदापे तो ओल्ड age होम में भी निकल  जाता है
क्या पाता कितना वक्त हो उस पड़ाव पर इतने बड़े महलो में एक दीपक भी नहीं जल पाता है
बचत अपनी जगह है और पैसे का जूनून अलग है
कितने ही तनहा लोगो का जीवन चार कंधे के लिए  तरस  जाता है
 जवानी में अपने शौक दबा कर बुदापे में समय का इंतज़ार करते है
जब अकेले रहने की आदत हो जाती है फिर एक साथ मिलता है
तब तक तन्हायी बहुत अपनी  सी लागती है
अलग शौक पल जाते है उस  समय के तुम्हारा साथ खलने  लगता है

बुधवार, 17 नवंबर 2010

सिर्फ

गुप चुप निकलते हुए कई  बार बहुत कुछ देखा  है
अपने खयालो  को बादलो में घुलते  देखा है
पानी  में अक्स को डुबाया है
हसरतो  को असमा में उड़ाया है
जीवन  को नयी दिशा देने का एक प्रयास किया है
फिर एक बदली आती है मन को भिगो  के
अरमानो के पंख लगा कभी इन्द्रधनुष  तो कभी
आंसू की झड़ी दे जाती है
एक पल में अपना बनाके छोड़ जाती है
इन्द्रधनुष तो भूल जाती हु सिर्फ झड़ी रह जाती है

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010









 


दिवाली के इस अवसर पर
हार्दिक शुभकामनाये
 दिवाली मंगलमय हो !!

कुछ चिराग यु जले की धुआ भी न हुआ
आज कुछ घर ऐसे भी रोशन हुए की चाँद फीका पड़ गया
कही पैसा कही प्यार की अलग है यह ख़ुशी
अपने अपने मायने और दायरे है
ज़रा पंख  पसरो और दुनिया देख लो
दुनिया के मायने खुद ही बना लो
एक मुठी भी है और पूरा आकाश भी
हमेशा जहाँ का पूरा साथ बना रहे

थोड़ी जगह हमे भी दे दो
दिवाली के इस अवसर पर
हार्दिक शुभकामनाये

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

असफलता का एहसास क्या होता है  मुझसे पूछो
जब हमेशा न सुनना होता है
जब हमेशा रुसवायी होती है
हमेशा कोई रूठा रहता है
आंसू आना चाहते है  पर हँसी आती  है अपनी किस्मत पर
जब एक कन्धा चाहिए होता है रोने के लिए पर लोग  चार लाना चाहते है
आप अपना दर्द बया करते है लोग पागलपन समझ बैठते  है 
हमारे प्यार का अपमान  कर अपने दायरे बना लेते है
झुक तो बहुत गए है पर प्यार  न मिल सका
एक इज्ज़त थी वो भी दाव पर लगी है
एक घरोंदा  का सपना था आज वो भी जाता दीखता है
चंद लोगो को अपना मान बेठे थे, आज  अपने भी गवा बेठे \\

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

लुका छिपी विचारो की

बिखरे हुए विचारो  के उमड़ते घुमड़ते सागर में बहुत कु
कभी कुछ लड़ी याद आती है पर वो बात  नहीं बन पाती
कभी बिस्तर पर पड़े कभी गाड़ी को चलते हुए
कभी  खुले आसमा  के तले, कभी करची के परे
कहाँ कहाँ  कागज़ पेन चिपकाऊ पर..? इन विचारो को न पकड़ पाऊ
यह  लुका छिपी आज की नहीं बरसो की है
कभी बच्चो  की मासूमियत कभी बड़ो का प्यार
कभी सैया के तकरार कभी ढेर  सा प्यार
त्योहार का खुमार या हार की याद
दिमाग की तह से निकलते धुध  में खो जाते
जल्द  अक्स न तो अपनी अपना साया भी न छोड़ आते
बड़े  अपने से लगते है यह विचार
एक सार निकलते जाते है अपनी जगह बनाने को
विचारो का भी अस्तित्व है कितनी अद्भुत एहसास है
बड़ा आनंद आता है इनको सजाने  के बाद
अपने  अक्स की झलक तो दिख ही जाती है
 हर विचार के साथ एक बार मेरी भी शुद्धि हो जाती है
अपने को जानने के लिए बहुत है चंद अल्फाज़
उनके गहरे होने के मायने है लम्बाई के नहीं
उच्च विचार या तुछ विचार नहीं
विचार के विकार है मन का अविष्कार है
एक बार स्वछंद कर को विचरो को
कभी कलम से कभी अल्फाज़ से
जीवन को नया मोड़ मिल जायेगा बहुत से जवाब दुंद लाओगे
कहने को जीवन असं हो जायेगा
बड़े मस्त मस्त है उड़ते रखते चलते फिरते यह विचार  

सोमवार, 27 सितंबर 2010

अपना साया

चाँद फीका पड़ा गया
अब नहीं किसी का इंतज़ार रहता
किसी से कोई चाहत नहीं
इस  रुसवायी की वजह न जान पाए
कभी असमान के सितारे अपने से थे
कभी चाँद में एक अक्स दिखता था
कभी मन में उमंग बस्ती थी
हर सुबह नयी लागती थी
बिन बारिश जीवन इन्द्रधनुषी होत्ताथा
हर पल किसी  के खयालो की महक थी
एक पल में रेत की तरह सब बह जाता है
ताश की मीनार सा डह गया
मेरे ख्वाबो का गुलिस्तान
अपने साये के तलाश में रूह सी भटक रही हु
फिर से जीना होगा नए सपने सिने होगी
एक नज़रियाँ छोड़ के नए में अपने  को पिरोना है
बस अपना साया मिल जाये
सपनो उम्र खुद बा खुद नाप जाएगी

रविवार, 12 सितंबर 2010

बीवी के entertainment

नारी तेरी यही कहानी

पति परमेश्वर समझ सब करना
उसके लिए नौकरानी से ज़यादा कुछ नहीं
बस ! तुम करो और कर करके मरो
उसके लिए करो ..जिसको उसकी अहमियत हो
किसी को गरज नहीं किसी का करने की
क्या इसलिए करो या तुम प्यारी  हो इसलिए करो
एक तारीफ सुनाने के लिए के कान  तरस जाते
पतिदेव सिर्फ गलती की तरफ उंगली उठते
जिस दिन सज साँवर कर इंतज़ार करते उस दिन बहुत लेट आते
अच्छा खाना बनते उस दिन ज़रूर बाहर से खाना खा कर  आते
पति का मोबाइल ,ईमेल और कपडे ज़रूर साफ़ करते
पर शक की निगह ज़रूर उन पर रखते 
जिस दिन पति के टिफन  में इलू लिख कर भेजते  अपना टिफन  किसी और को दे देते
यदि पति सिसकी न सुनते रात को तो बच्चो को डांटते  या गाने लगा देते
पति भी कम नहीं कहाँ गयी क्यों गयी
बड़ा बन ठान के जाती हो
पैसे और घुमाने की बोलते ही
स्वामी -एक करवट लेके सो  जाते
और तुम जूते की नोक पे रहोगी हमेशा
 २१ २२ २३  या १ सदी क्यों न आजाये
यह हमने नहीं भगवान ने नियम चलाया है
नारी --फिर गरजती है चंडी बनके
सारी राम कहनी सुना देती
कपडे प्रेस से लेकर खाना  बनाना
मुने मुनि को सँभालने से लेकर झाड़ू पोछा  लगाना
आखिर में स्वामी हमें प्यार नहीं करते
किसी और से करते है अपनी ही सहेली का नाम लेके
बेचारे स्वामी का जी दुखन
और खुद जोर जोर से रोने बेठ जाना
बड़ा ही रोचक है यह ड्रामा
जब ऊपर भगवान से पुछा तो बोले यह सब अपनी बीवी के entertainment के लिए   बनया है
वर्ना सारा दिन मेरे काम में disturb  करती है
पर भगवान हमारा क्या
अरे तुम्हरे लिए एक्ता कापुर को भेजा है न

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

ख्याल

खाली तस्वीर में अक्स उभरने लगे है
मन में अरमान पनपने लगे है
बेताल होती सासे किसी का इंतज़ार रहता है
हर आहट   पे कदम ताल सुनायी देती है
धड़कन में कोई बस्ता है ,सिर्फ उनका इंतज़ार रहता है
जब हमारा साथ हकीकत में बदल जायेगा
और अपनी शर्तो को सपनो से हकीकत बन जायेगा
उस पल के रूमानियत से आज हम भीग जाते है
न जाने कैसा  होगा वो पल बस उसकी तमन्ना  है
 उसके ख्याल में इतना प्यार है न जाने हकीकत में कितना होगा
हर लड़की का सपना होता है  बाली उम्र से
उसका पूरा होना सुकून है और ऊपर वाले के मेहर है //

बुधवार, 8 सितंबर 2010

घुन

अरुण ,बेटा तुम्हारे  लड़का हुआ है तुम्हे सब को देना है अपनी बहिन को , अपने भाई को........  पैसा भेज दो /
अच्छा माँ ,में २-३ दिन में  भेज पाउँगा ...
कितना भेजोगे ?
पांच हज़ार
बस ...इतने में क्या होगा ?
पर माँ अभी २ हफ्ते पहेले तो भेजा ...............
तो पूरी गृहस्थी  है .......लेना देना आना जाना लगा रहता है .......और  में अपने लिए थोड़ी तुम्हारे बहिन भाई के लिए ले रही हु
अरे, माँ आप  तो नाराज़ हो गयी
तू बात ही ऐसी करता है ....बोले तो हिसाब लिख कर भेज दू ..
अब तू कमाता है तो करेगा भी अपने माँ बाप का बड़ा पुण्य होता है ..बहिन बेटियों  को तो देना पड़ता है ..इतनी बड़ी नौकरी है तेरी .......
बड़ा शहर बड़े खर्चे  बड़ी नौकरी सब बड़ा है ..............माँ
क्या ?
अच्छा माँ रखता हु ..
अच्छा .....जीता रह ...पैसा ज़रूर भेज देना
हम्म
रमा में आ रहा हु बाज़ार से सामान लेके
अच्छा ..ठीक है
लगता है रमा ने मेरी बात नहीं सुनी आज ..वर्ना पैसे भेजने की बात पर कुछ बोलती ज़रूर ...इसलिए में तो निकल आया अभी माँ की सुनो ,..फिर रमा की ...कल बच्चे अलग कुछ बोलेंगे ....इसी उधेड़ बुन में सामान खरीद लिया
घर पहुंचा ..
 खाना लगा रही हु ..हाथ मुह धो  कर आ जाओ
हाँ ,आता हु मुन्ना सो गया
हाँ ..
खाना अच्छा बना था
हम्म
क्या हुआ ?इतनी चुप क्यों हो रमा (तूफान से पहेले की शांति )
आज माजी ने फिर पैसे मांगे न
हाँ
देखो ,में तुम्हे बोल रही हु अभी सब एक लिमिट में कर दो कितने बरसो से तुम्हारा फायदा उठा रही है जब मुन्ने के टाइम पे हमे ज़रूरत थी........ तो कोई नहीं आया ......तब तुम्हारी याद किसी को नहीं आये तुमसे सारा पैसा लेके २ किलो लाडू भिजवा दिए न कोई हमरे लिए पूजा पाठ न कुछ..... बस जो दीदी के नेग का था ...अब फिर से नेग दो ...भाभी का नेग होत्ता है यह तुम्हारे भाइयों बहनों को याद नहीं क्या ? मुझे बहुत कोफ़्त  होती है इन सब चीजों से एक माँ होते हुए भी भेद भाव
रमा तुम्हे कोई कमी तो नहीं ........
अरे, में तो कमी में भी तुम्हरे साथ रह लुंगी ..पर तुम्हरे पैसे की दिन बा दिन बढ़ते दवाब  को नहीं झेल पाऊँगी तुम्हारे सपने कहीं खोते जा रहे है.. मैंने मुन्ने का आना और नहीं खिसका सकती थी ..आने वाले समय  में तुम्हारे खर्चे  बढेंगे ही..में मानती हु तुम बेटे हो तुम्हे करना चाहिए पर इतना नहीं कर सकते ...हमे  यह बात माजी को समझनी होगी ..तुम एक बार मुझे यहे सब करने दो में संभल लुंगी ..पैसा पेड़ पर नहीं होता  तुम रात को ३ -३ बजे तक काम करते हो ........आज हमारे पास कोई सविंग नहीं.. कोई मकान नहीं ..मुझे मकान का कोई लालच नहीं पर में तुम्हारे सपने नहीं तोडना चाहती ...रोज़ रोज़ तुम्हारे इस दवाब को मांगो को कभी बहिन कभी भाई  कभी रिश्तेदार कभी दोस्त .....अब तुम्हारी फॅमिली है उनकी जिमेदारी है......तुम समझो सब भाई बेठ कर थोडा थोडा पैसा हर महीने भेजो माँ के पास उसमे किसको को बोझ   नहीं पड़ेगा और माजी को बोलो इसमें ही आपको सबका करना है ..एक सविंग अकाउंट खुलवा दो बोलो इसमें हर महीने पैसा जमा करा करो ..इससे बचत भी होगी और सबके बच्चो के नाम से RD खुलवा दो माजी उसमे जो पैसा डालेंगी वो माजी के नाम से हो जायेगा तुम अपने लिए बोलके देखो ..
हम्म
श्याम ,हम्म हां नहीं पैसा बुरी चीज़ है लड़ाई करवाता है इसमें बिलकुल साफ़ और सटीक  रहना चाहिए
कल तक दस हज़ार में ही खर्चा चलता था आज बीस ही पूरा नहीं है कल तीस पूरा नहीं होगा ऐसे तो बढ़ता  जायेगा तुम पर दवाब भी तुम्हे ही ऑफिस जाना होता हो एक स्तर दिखना होता है .अकी तुम्हरे है पैसे का रोना रोते है हम खुद कमी  में रह कर उनको पूरा करते है ...पर बेफिजूल के खर्चे  का बोझ  है ..तुमने घर बनवा  दिया  ,,सारा सामान आ गया ..नहीं तो उन्हें यहं बुला  लो इसे तो कम ही खर्चा  पड़ेगा ......अच्छा चलो छोड़ो तुम  जा कर सो जाओ ..वोही करो जिससे तुम्हे संतोष हो....
न जाने लोग शादी क्यों करते है यह तो कह नहीं सकता माँ क्यों होती है पर यहे बीवी बाला तो लगता है भगवान को भी नहीं छोडती .....
अरी श्याम किस उधेबुन में जा रह हो ज़रा रुको तो कुछ नहीं ...तुम कहँ से आ रहे हो पास ही बैंक से माँ को रूपये भिजवा रह था ..
अच्छा तुम भेझते तो सारे
नहीं रे सब भाई मिल कर एक बराबर करते है
सही है
अगले महीन जा  रहा हु घर सब के लिए कुछ लेना है ...
हम्म
क्या बात है इतने उदास क्यों ?
बीवी ने कुछ कहँ वसे तुम्हारी  बीवी इतनी समझदार है ..........
अच्छा मुझसे पूछ ...नहीं
मेरी बीवी को तो ज़रा से पैसे  भेजना भी नहीं पसंद ...गिफ्ट ले जाती है क्योंकि सब उसको कुछ न कुछ देते है वर्ना .....और कोई काम नहीं करना पड़ता ...वहां
अम क्या बात है
कुछ नहीं
में चलता हु
सही बोला मेरी रमा ने कभी मुझे नहीं रोका  मैंने जो करना चाह हमेशा मेरा साथ दिया कोई आ जाये तो चार सब्जी जल्दी से बनके अच्छे से रख दे ......घर मेरा कपडे मेरा सामान मेरी पसंद न पसंद का कितना ख्याल है ...और भी बहुत कुछ पर न जाने में ज़िन्दगी  से क्या चाहता हु उसको खुश नहीं रख पाता ....उसमे  कमियां निकलता रहता हु ..पर में उससे बहुत प्यार करता हु ..बस चोचलेबाजी नहीं कर पाता....  जानता  हु  जो  वो  बोलती  है  वो  सही  है   ..लेकिन  माँ  के  प्रति  मेरा  फ़र्ज़  है  कभी  कभी  वो  उसका   फायदा   उठती है ....पर हर व्यक्ति का फायदा कोई न कोई तो उठता है ...हर आदमी एक घुन  होता है ...कभी कही से पिस्ता है कभी कहीं से ....मज़े की बात  ..भगवान का बनया हर आदमी घुन होत्ता है अगर वो कमाता है तो ..........

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

पुश्तेनी मकान

पुश्तेनी   मकान नहीं तंग गली या पुराने इलाको के आज के interior में जमते नहीं
न गर्मी की छुट्टी में शोर होता है न  ठहाको  की आवाज़ आती है
बस सबकी व्यस्त ज़िन्दगी और महंगे  सामान  की होड़ हो गयी है
क्या कभी कोई  मुड कर नहीं देखना चाहता अपने  बचपन को
वह  गली पुकारती है बचपन जीने के लिए, पर महंगे कपड़ो  पर दाग न लग जाये
इसलिए कदम रोक  देते है कभी अपने बच्चे  ही कंजूस लिविंग बोलके चल देते है
आज कुछ नहीं कमाते  तो इतना दम दीखते है
कल का जाने क्या होगा जब यह कमाएंगे
अपनी दादी की भाषा में प्यार पाने का मज़ा क्या पैसे से ले पाएंगे?
नानी की दुलार का कौन सी सम्पति में हिस्सा पाएंगे?
माता पिता ने सब किया एक अच्छा इन्सान बनाने के लिए
उन्हें क्या मुह दिखेंगे की काम पैसे में पाला हमें किस मुह से बोलेंगे?
जबकि हमने देखा है उनकी छोटी छोटी बचत को
आज हर रोज़ नए मोबाइल  टीवी कार घर घूमना खाना पीना फ्लिम
शराब शबाब कबाब क्या यह सब जीवन है?
नहीं पाता चाचा चाची ताऊ ताई उनके बच्चे
कल तक एक गठ जोड़  में बंधा परिवार आज छन से बिखर गया
सिर्फ बड़ी बड़ी तस्वीर अब अलमरी के अन्दर एक बोझ हो गयी
कभी यह बड़े कमरे में लग घर के बुजुर्गो और अमीरी की निशानी थी
आज एक जगह घेरने  वाली चीज़ रह  गयी

नहीं इतना जगह माँ बाप को क्या उनकी तस्वीर को क्या दे 
 कल हम अपने मातापिता का घर outdate लगता था
 अब हम और घर दोनों बच्चो को outdate  लग रहे है 
 outhouse में होंगे कल पुश्तेनी   मकान और हम 


Train To Pakistan...Based on the Novel by Khushwant Singh

इज़हार

तेरे खयालो की खुमारो में सब गवा बेठे
तेरे प्यार की लौ में खुद को जला बेठे
तेरे इंतज़ार में कान लगा  बेठे
तेरे प्यार  में खुद को गवा बेठे
एक इज़हार की रहा में सर झुका के बेठे है

शनिवार, 14 अगस्त 2010

मेरा देश

शत शत नमन!! ६४ स्वतंत्रता  दिवस पे एक छोटा सा प्रयास

यह है मेरा देश प्यारा
भारत है इसका नाम
चारो लोक में है इसकी शान
जग है सबसे चमकता तारा
                        जन -गण- मन है राष्ट्र गान
                        वन्देमातरम  राष्ट्र  गीत
                       मोर,चीता,कमल है हमारे
                        राष्ट्र पक्षी ,पशु और फूल
                         सचाई है धरम हमारा
                        प्यार हमारी भाषा
                        इन सबका संगम है देश हमारा
पग पग पर बदलती भाषा
खाना और पहनावा
नहीं है कोई मन मुटाव
न कोई छोटा न कोई बड़ा
न उंच नीच न जात पात
हम सब एक समाज
इसी में है हमारी शान
                               एकता है हमारी ताकत
                              प्यार हमारा  बल
                              होसले है बुलंद  हमारे
                                कर देते है पस्त
                              दुश्मन के इरादे

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

व्यथा

ख़ामोशी  पाव  पसरती सी
कभी आंसू कभी उदासी बनकर
टूटे कांच के टुकड़ो  में
अपना अक्स  तराशती  सी
खोई सी हैरान है
अपनी ही परेशानियों से त्रस्त है
जीवन  के अस्त होने का इंतज़ार करती
तन्हाईओं  में साथी ढू ढ ती  सी
 बंद  कमरे में  अकेली
अपने विचारो से जूझती
अपनों के पराया  होने से हैरान
बेजान महसूस करती सी
भारी कदमो से आगे बदती हुई
जीवन पथ पर भटकी सी
अपने में  ग़ुम होती सी
अधूरी तमना  और चाहत के बोझ  के साथ
 मुरझाये  फूलो के तरह
पतझड़ के सूखे पतों सी
हवा के हिसाब से चलती हुई
जमी में अपनी जड़ सी जोडती  हुई
अपनी कब्र पर फूल चढ़ती  हुई
अपने आंसू छिपाने की बेअसर  कोशिश करती हुई
अपने हाल पर हर किसको तरस खाता देखती सी
अपनी गलती ढू ढू ती    सी
अपनी शंकाओ का समाधान खोजती सी
खिलोने सी घुमती हुई
गम के संदर में हँसी तलाशती
खुशियों के बहाने बनाती
अपनी खूबसूरती अपनी प्रतिभा छिपाती
कोई नहीं जो दो मीठे बोल बोल दे
दो रोटी के टुकड़े  निगलती
माँ बाप के होते हुए अनाथ सी
थरथरते होटो से अपनी बात बोलने
व्यथा  को व्यक्त करते हुए
                                आगे ..................

मज़ा

यह जान पहचान बरसो पुरानी है
सारी बात आँखों में हो  जाती ही
तेरी मेरी प्रीत का प्रतिक  है
यह अटूट रिश्ता
आ बेठ...! थोडा सुस्ता ले फिकर  को उड़ दे
रेतीली ज़मीन पे भी मज़ा है लोगो को दिखा दे /

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

शाहरुख़ थोडा थोडा

वीर ज़रा के अंजाम के डर से कुछ कुछ  होता है
रामजाने इस दीवाने के चाहत का काल हो गया
दिल तो पागल है इसे ही बाज़ीगर चलते चलते थोड़ी बनते है
यह तो स्वदेश जाये आखिर फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी
और यह तो बादशाह का दुप्लिकाते
और एस बॉस करने वाला है
अब खुद डन हो गया है
कभी कारन अर्जुन कभी गुड्डू
सब सत्ता का चमत्कार है जीवन नहीं एक पहेली  है
पाता नहीं कल हो न हो
वसे भी कभी ख़ुशी कभी गम
पर साथिया जनता था दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे
इसलिए तो राजू बन गया है gentelman
अब तो ॐ शांति ॐ है
लेकिन उसका नाम है खान

सोमवार, 2 अगस्त 2010

Magical

I love u from the deepest corner of my heart
I want to give u all the happiness u deserve
You cast your shadow on my mind
This all is so natural I cant keep my self out of it
My mental strength is unpretentious
A feeling of being in love with some one is immense and real
You are important to some one gives u privilege to think more deeper and intense
My love for u is innocent and genuine
I do not expect any commitments from ur side
Always wish to see u happy
May GOD fulfill all ur dreams
This is my biggest dream being your wife

रविवार, 25 जुलाई 2010

Just…… a thought away

The obstacles of life
The failures of life
The tears u drop
The hurt u felt in the heart
The passages closed for u
The closed hands
The lost confidence
Can see only the back of people
The crude smile on the faces
The closed doors
The place where no one is known to u
You Are  criticized by every one
You Are  left by loved ones
You Are  all alone
But You Are just a thought away
You  have to overcome this phase of life
You  are a winner
This phase of life comes in every one’s life
Where no one is there to share the heart
Just a feel to get out of it
It is a feel you  can’t even come out it nor u can stand
Still you have to go on.
After bearing all this You  are ready to enjoy each moment of life
You can face any situation, you can deal any problem ,you can understand other’s problem
You are able to trace the hidden paths of the life
You will fulfill your dreams
You are ,Just a thought away

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

Is this all so big……………..

Shattering of the target
Losing the loved once
Failures of life
Does they are so big that we should decide to compromise the most precious gift of GOD - our life
Why don’t we make memories of loved ones our strength
Why do not we try to learn, from our failures
Why we make the target that are so difficult to obtain , do these target really u want to achieve or just the pressure u have
So better stabilize u r self , Think once more
Are u good human being?
Do u work for others without any expectation just because u want to do it?
do u have any bad habits?
Can u love a person astatically ?
Can u tell the truth to a person and help them to come out of it ?
Do u wish to help the person who are tired and exhausted?
Do u have any wish u really wann to fulfill with the most deepest corner of u r heart then just go for it
Do u try to find the alternate of the problem rather then analyzing its size?
U too have a right to live
Let u open u r wings and spread the love ,care ,dedication to those to those who need us
No matter that person is ur known or unknown

सोमवार, 5 जुलाई 2010

अब जब में इंडिया जाऊँगी

अब जब में इंडिया जाऊँगी
न में हिंदी में बात करुँगी न नमस्कार करुँगी
hi hello में  ही सबका उतर दूंगी, काला  चश्मा छोटे   कपडे,हाथ में पर्स
हाई हील ,गर्दन में कलफ
सादा  पानी  नहीं बिसलेरी लुंगी
मेरे लिए  ए सी लगवाओ
नरम  नरम बिस्तर लाओ
 कोर्न्फ्लाकेस का नाश्ता बनाओ
खाने में पास्ता ,सलाद पिज्जा और फ़्रुइत्स ही खाऊँगी
अंगेरजी में बाई को  हुकुम  दूंगी
अबकी जब में US से इंडिया जाऊँगी
यह सब काम करती हु किसी को नहीं बताउंगी
काम तो पति करता है पर अफ्सरनी  में दिखाउंगी
बच्चे को छुते ही santitizer  लगने का निवेदन करुँगी
यह बाई के सब काम करती हु वह तो अफसर बनाने का काम करुँगी
US  का रोब ही बहुत है
कितनो को पाता है असलियत
यह कंजूसी  से रह कर --कर रहे  है बचत
वह लुट कर लोगो पे रोब जमा देंगे
इसलिए तो २ साल में एक बार ही घर के द्वार दस्तक देंगे
यह की अच्छी चीओ का बखान कर
घर से दूर रहने के दंश को छिपा लेंगे
अबकी जब इंडिया का रुख  करेंगे
 जीवन की किताब से
  •  अपने फ़र्ज़ को अच्छे से समझो और हेमशा पूरा करो
  • कभी खाने पर गुस्सा मत उतारो
  • अपने दिनचर्या को सुचारू और अनुशासन  के साथ शरू करो 
  • कभी दिल दुखाने वाली बात मत करो
  • झूठ,कायरता  और बुरी लत से दूर रहो
  • शरीर का सम्मान करो और उससे स्वस्थ रखो
  • हर काम को पुरे मन और लगन के साथ करो 
  • हर इन्सान का सम्मान करो
  • अपनी कमियों को जानो और स्वीकार कर सुधार  करो
  • एक न एक अपनी पसंद(रूचि ) का काम ज़रूर  करो  
  • इस दुनिया  में आने के बाद जो जीने के कायदे है उन का पालन करो
  • अपनी पसंद का भोजन  करो
  • देश के हिसाब से भेष रखो
  • शांत और सात्विक जीवन जियो
  • रोज़ तीसरी शक्ति का नमन करो
  • गीत के पाठ का ध्यान करो , कर्त्तव्य ,जिमेदारी ,दुनियादारी में संतुलन लाओ 
  • जीवन अच्छे  परिवर्तन और आगे बढने का नाम है 
  • जीओं  जीवन बिंदास !

बुधवार, 30 जून 2010

Is this happy living?

The most part of life is empty and uncured
We live just because we are not dead
We love because we are fool
We die for someone because we wann someone to die for us
We hate someone to show how good we are
We get irritated because we believe we are more knowledgeable and one cannot work without us
We miss someone because that person is not giving us importance
We forget something to show us busy
We remind someone when we face difficulty
We help someone so that someone should help us when we need
We dream because we cannot reach there
We plan because we can make it successful
We lie as we find the front person fool
We are true because we trust
We cry as we felt sad inside deeply
We smile as we are full of joy
Always anywhere every where only us and for us
Never clear in our thoughts
Is this all called living life happily ?

शनिवार, 26 जून 2010

आज में परायी हो गयी हु

आज में परायी हो गयी हु
माँ को आना खटकता है
भाई को समय नहीं मिलता है
बहिन को काम हो जाता है
पिता को खर्चा सताता  है
आज में परायी हो गयी हु
दिल से सबके बहार  हो गयी हु
बड़े अफसाने दिए याद के आज तो बस में
एक भूले  बिसरे ज़माने के याद रह गयी हु
जाने क्यों सब ने किया एसा कुछ पराया
मुझे अपना जनम द्वार ने बेगाना बनाया
नारी के अस्तित्व की है लड़ायी
एक घर जन्मी तो दुसरे घर से विदाई
कभी डोली कभी अर्थी में  विदाई 
बस इसके बाद कभी नहीं वो किसको याद आई
एक बेटी फिर माँ बनकर यह सब दोहराती
अपनी विदाई किसको याद नेहीं आती ?

शुक्रवार, 25 जून 2010

Friends

Friendzship is the eternal part of life where we learn to grow revise ,live and forget rest,
We share laughter's and sorrows together,
We share the deepest corner of our heart,
Even we r apart in our streams still we r
together, even we got married ,
We share small happiness , burst laughs ,
Come out of deeper sorrows ,shedding bucket full of tears on the shoulders
We broke the wall of formality hesitation and become weird,
Whole world sounds worthless,
Our all stupid plans work like anything ,watch movies ,fares, kitties, restaurants garden temple all
We freak out on peaks and made the world so small to catch up in few turns,
Its was so wonderful and unforgettable to come out ,
only memory give us support and provoke us,
Motivate us to grow,
how important and precious those days are,
where we have spent our time without looking pros cons having don't care condition follow the lives like this way only
Love to be this manner, it is for one time only.
Making best memories out to live forever…………..

एक बार फिर.........


















कुछ  इचछा  मर से गयी है
कुछ तमना  दब सी गयी है
 कदम कुछ उखड से गए
इस जहाँ में एक सूनापन छा गया
 थोड़े से की चाहत  में पूरा लुटा बेठे
बड़े  सपने  पाले थे आज सब गवा बेठे  है 
क्योंकि नए पंख के लगने का इंतज़ार था 
आज पिंजरे  में बेठे है 
रोज़ सुभ नए सूरज को नमस्कार कर 
शामको ढलते सूरज वही पुराना लगता है 
जाने क्यों फिर सुभ नया लगने लगता है 
चाँद में भी तन्हायी नज़र आती है
तारों के चमक फीकी सी लगती  है 
पुराने सपने नए विचार में बुनते रहते है 
पूरे होने की आशा में एक किरण के तरह याद आते रहते है
संपनो को बुनते समय पंख ला देती हु 
कल फिर उड़ने के लिए
नए विचार में एक बार फिर गुम होने के लिए 
हमेशा हर सपने का ओर -छोर हो यह ज़रूरी तो नहीं 
वसे भी फलसफे तो बहुत होते है 
 दुसरो की थाली में जायद ही दिखत या 
छायी वो प्याज़ हो या काजू 
किसको फर्क पड़ा है 
अपना सिक्का खोट लगने वालो को 
कभी कुछ किसकी का अच्छा लगा है..
सबने बहुत कुछ कहाँ हा यही सोच में भी कह बेठी 
क्या रखा है इन सब में यह तो हमेशा लगता रहता है ...............




सोमवार, 21 जून 2010

मेरे पापा

आपने  अपना नाम दिया 
जीने का होसला दिया
नयी सोच और दिशा के साथ बढना सिखाया
जीवन के कठिन ताल मेल को असं बाना कर जीना सिखाया
सहज सुन्दर सुदूर सोच के धनी मेरे पापा ने
कभी नहीं कोई भेद भाव दिखाया
इतना प्यार दुलार दिया
कभी नहीं कोई हुकुम चलाया
एक अच्छा इन्सान बनाया
यह मेरी खुशनसीबी है आपको मेरा पापा बनाया

रविवार, 20 जून 2010

अखबार

रोज़ सवेरे आ जाता है
दिन दुनिया की सेर करता
रद्दी वाले को बहुत भाता
सुबह के चाय नाश्ते का है साथी
हो चाहे बॉलीवुड तमाशा
या हो राजनेति का मुह काला
खोल देता सबकी पोल
चाहे हो सर्कार का परिक्षण
या फ़िल्मी मिर्च मसाला
बच्चो को बल पृष्ठ प्यारा
रविवार को होती आपाधापी
पहेले आये किसकी बारी
अलग है सबके नाम
पर सबका है सिर्फ एक काम
सच्ची से यह कभी न डरते
दीन दुखियों का दर्द समझते
कई घटनाओ का आधार है
सही परखना जनता का अधिकार है

मंगलवार, 15 जून 2010

मन

कुछ  बूंदे  आँखों से गिरी जमी को नम  कर गयी
हाथ कंधे पर रखा चलने की ताकत आ गयी
साथी ने हाथ बढाया ,लावो  पे मुस्कान तेर गयी
कुछ कमाल ऐसे ही है इस दुनिया में
जिनका राज़ कोई  जान न पाया
कभी  जीवन  साथी  का साथ पूरा होकर दिल को छु जाता है
कभी एक बोझ सा लगता ठेलता रहता है
सारी दुनिया बुराई का पुलिंदा लगती है
कभी अच्छाई का  सागर
बस मन को काबू में रखना होता है
सारी कहावतों के सार को न जानते बुझ पाना मुश्किल है
जीवन भी उसी के तरह है
मन की थाह -- रहा बना ही देती है
हाँ--न के बीच के पसोपेश मौके गवा देती है
अरमानो को न मरने दो .......
गुम हुई चीज़ की मिलने की अहा भी जीवन भर रहती है ..
मन को मरने दो ............जीने की रह तो मिल ही जाती है ................

तितली

रंग बिरंगे पंखो वाली
मस्त मस्त चलो वाली
फूलो का रस पीती हो तुम
लगाती हो कितनी प्यारी
हर जान का मन मोह लेती है
हर दम अठकेली ,मस्ती करने वाली
कोमल कोमल पंख तुम्हारे
छोटा है जीवन
बगीचे की शान हो
खुबसूरत इतनी हो तुम
पर नहीं है ज़रा गुरुर
इसलिए तितली रानी
तुम सबको इतना भाती हो

गुरुवार, 10 जून 2010

Love is in the air

तनहा रहने की आदत सी हो गयी है
हवा का झोका भी मेहमान लगता है
मन के विचारो को दबाने की आदत सी हो गयी है
बारिश के बूँद भी शोर लगती है
कुछ संजोय हुए लम्हे है
अब वो भी पराये लगते है
किसी की दस्तक से रूह तक कंप जाती है
इतनी व्यस्त जीवन मेरा ख्याल किसे आ गया
अब तो लबो पे हँसी भी रूठी रहती है
जयादा खुल नहीं पते कभी खुले तो आँखों से आंसू बह निकालेंगे
तूफान का सामान किया है
अब जलजले का इंतज़ार है

शनिवार, 5 जून 2010

होली

           
रंगों की भर आई
काला, हरा ,लाल ,गुलाबी
हर मुख रंग है
सब मुखड़ा लगता है मुखोटा
कोई नहीं पहचान आ रहा भाई
पहेले जी भर के रंग लगओ
फिट घंटो बेठे के रंग छुडाओ
फागुन है आया रे भाई
                     डंडा लगा है बीच बजरिया
                      चंदा ले खूब सजा है
                     रस रंग में इस त्यौहार ने
                      सबको अपने रंग में रंगा है
भैया ने की पिचकारी की सफाई
मामी ने पकवान बनाये
हम सब खूब जे भर के खाए
भाभी पड़ा गयी देवर पे भारी
जीजा न साली की क्लास लगा डाली
टोलियों ने धूम मचायी
होली आई होली आई

बुधवार, 12 मई 2010

hey baby

"अरे , बेबी  मेरा  प्यारा  बेबी कुची कुची ,कैसा है तू  come यहं रख लो अपना , सर "
यह आवाज़ सुन इतना अच्छा लगा रहा था मेरी पीछे की सीट से कहीं आवाज़ आ रही थी / मुझे लगा कितने प्यार से एक माँ अपने बच्चे को सुला रही है या खिला रही है /बड़ा अच्छा लगता यह सब देख कर पीछे मुड कर देखना अच्छा नहीं लगता इसलिए नहीं देखा आँखों के कोने (कनखियों ) से दिखयी नहीं दिया .....
बेबी बड़ा समझदार था, माँ के बोलते ही चुप हो जाता आवाज़ तो -मुझे आ ही नहीं रही थी /इतना शांत बेबी इतने लम्बे सफ़र में कभी नहीं देखा /अच्छा ही है किस्मत वाले है / ज़रा उठी पीछे देखने के लिए पर कोई सीट पर था नहीं मुझे लगा रेस्ट रूम  गयी होगी या बच्चे का diaper बदलने गयी होगी ........
जैसे जैसे बच्चे को  बेबी बेबी करके खिलाती मुझे बच्चे क देखने की ललक बदती जाती ..खेर अब तो सफ़र ख़तम  होने वाला है अब तो देख ही लुंगी /
अरे, बच्चा कहाँ है दिखा ही नहीं रहा ..मेरे पति ने बोला चलो  आगे में आगे बढ गयी / जब lugage   के लिए रुके तो मिल गयी में खम्बे  के पीछे से देखा वो बेबी बेबी कर रही थी पर यह क्या .........................अपने पति को बेबी बेबी बोल रही थी .मुझे कानो पे विश्वास नहीं हुआ ...अपने पति को बताया तो बोले ,आजकल का फैशन है पति या बॉय फ्रेंड को बेबी बोलना .........
मैंने सोचा फिर बच्चे को क्या बोलते है ?
वसे तो सही है , आजकल पति का नाम लेते है और बच्चो से आप आप करके बोलते है /
अब तो हर पति hey baby लगता है  है

शनिवार, 8 मई 2010

माँ मेरी माँ

मेरी माँ मेरा गर्व मेरा गुरुर ....में बहुत खुश किस्मत हु माँ --की आप  मुझे मिली ,मैंने  हर बात आपकी मानी और अपनी हर बात आप को बतायी ,कभी कभी आपसे  तकरार भी की गुस्सा भी किया पर दिल से आपका सम्मान किया आपको  प्यार किया आपके स्पर्श से अभिभूत   हुई हु .आज आपसे बहुत दूर पर आज बहुत करीब हो गयी हु . भगवान् का बहुत बहुत धन्यवाद की आप जैसी  माँ दी मुझे .............


 अंगुली पकड़ने के साथ चलाया है
 मुझे कभी लोरी गा के सुलाया है
मेरे खाने के लिए घंटो इंतज़ार किया है
मेरी  पसंद  का  खाना  बनाया मेरा मन रखने के लिए
अच्छी सीख देके मुझे बड़ा किया
अपनी नीद खराब कर मुझे पढाया
एक अच्छा इन्सान बनाने और नारी की मर्यादा को समझया
अच्छी सोच और संस्कारो से मेरे विचारो को सीचा 
आज की और कल की नारी के अच्छे गुण अपनाने को बोला
इतना प्यार और दुलार दिया
हमेशा हर मुश्किल  और नामुमकिन  काम को कर दिखाया
मेरे मन के डर दूर भगाया
हमेशा हर बात का डर माँ को दिखाया , कभी चिल्लाये  कभी गुसये 
कभी माँ का प्यार कम समझने की भूल की
ऐसी है मेरी माँ मेरी और मेरी माँ ........


माँ के सपर्श से बुद्पे में भी बच्चे बन जाते है
माँ के हर वचन सच लगते है जब खुद माँ बन जाते है
एक माँ को और भी ज़यादा प्यार और सम्मान करने लगते है

माँ Mother's day के अवसर पर आपके लिए कुछ  दिल से निकले  शब्द  शत शत नमन

शुक्रवार, 7 मई 2010

रेल गाड़ी

रेलगाड़ी  रेलगाड़ी
आगे इंजन पीछे डिब्बो वाली
इंजन है कभी काला ,कभी बिजली से चलने वाला
छुक  छुक करके चलती रेल
देखो , चुनु मुनु  मुड रही है रेल
सभी सभी सुविधाऊ वाली रेल
जसे जसे चलती रेल लगता भाग रहे
संग संग पेड़ छुट्टी आये रेल से जाये
कभी नाना नानी दादा दादी के यहं ले जाये रेल
स्टेशन पे चाय -पकौड़े अख़बार ,आइसक्रीम वाला चिल्लाये
उदास हो गया सोच कर मन अगले स्टेशन पे मेरा घर
अगली छुटी  फिर जब होगी इस रेल के  संग हो लुंगी

बुधवार, 5 मई 2010

में बनू बड़ी

में बड़ी तो बहुत हो गयी ,पर बचपन  में लिखी कविता को भूल नयी पाई ,बड़े दिल से इस कविता को महसूस किया है  / बहुत छिपाने की कोशिश करती हु बचपन को पर दिख ही जाता है  

हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ
खूब खेलु खाऊ पियु मौज मनाऊ
चारो तरफ धमा  चौकड़ी मचाऊ
सबको तंग  कर घर सर पे उठाऊ . 
                            हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ
                            मामी जसे पकवान बनाऊ
                            पापा जसे हुकुम चलाऊ
                            दीदी जसे पढ़ लिख जाऊ
                            भैया जसे गाड़ी चलाऊ
हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ
मामी पापा का नाम बढ़ाऊ
सुन्दर से घर में शादी कर के जाऊ
अपने सब कर्त्तव्य निभाऊ
लड़की नंबर वन कहलाऊ  
हे ! भगवान में जल्दी बड़ी हो जाऊ

सोमवार, 3 मई 2010

छुट्टी का जादुई मंत्र

छुट्टी आई सपने लाई
टिनी बोली - रहेगी मौज मस्ती , ग़ुम है पढाई
सोनू बोला - जा रहा हु घुमने भूलकर पढाई
दीदी आई बोली - पढाई नहीं है बोझ
इसने  तो जीवन की  ज्योत जलाई
तुम जो पढ़ते हो वही घूमते
जो खाते हो वही पढ़ते
तुम पेड़ पोधो  से प्यार करते हो
उन्ही के तंत्र का ज्ञान लेते हो
 अच्छा खाना पीना स्वस्थ रहने सीखत्ते है
फिर क्यों पढाई से जी चुराते
पहले  समझो फिर याद करो
ग्रह कार्य को सुगमता से करो
दीदी ने नयी दिशा दिखाई
जिसे देख में चिलायी
अब नयी तरह से काम करुँगी
मिनी इठलाई -फोटो और रिपोर्ट बनाउंगी जहाँ  में घूम कर आउंगी  
टिनी बोली में करुँगी  पत्तियों  का संग्रह
सोनू बोला - में अपने तंत्र और पर्यावरण की  साफ सफाई के तरीको को बाटूंगा
दीदी से जादुई  मंत्र के लिए धन्यवाद
चुटकी  में कर दियाछुट्टी  में सारे  ग्रह कार्य

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

गमगीन

कुछ सिसकियाँ सुन लेने से गम  का अंदाज़ा  नहीं होता
किसी की हँसी से रूह तक नहीं पहुंचा  जा सकता
दिल के राज़ पकड़ना इतना असं नहीं होता
थोड़ी ठोकर से संभालना लाजमी होता है
गमो की गठरी छिपना असं नहीं होत्ता
गमगारो से दिल्लगी न करो
चिंगारी को आग बनाने में देर नहीं लागती
हर कोई गम के समंदर से निकल पाए यह मुमकिन नहीं
गम से साये में छिपे चहरे  के अल्फाज़ पढना इतना असं नहीं होता
हर कोई दिल्लगी करे यह बर्दाश्त नहीं होता
ज़बा  में कडवाहट हो यह ज़रूरी नहीं
 मन का रास्ता साफ़ होंना चाहिए /

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

ज़मी का टुकड़ा

एक ज़मी  के टुकड़े ने किया सब से पराया
माँ -बेटे को दीवार बनाया
भाई भाई का दुश्मन बनाया
अपने अड़े वक़्त के लिए ज़मी का टुकड़ा लिया ,
 आज सारे  रिश्तो के अड़े आ गया .
  सिर्फ ज़रूरत के रह गए रिश्ते
अपने गड़े पसीने की कमाई  से खरीदा टुकड़ा
आज अपने खून को  पसीना करने को तैयार  हो गया
तिनका तिनका करके जोड़ा
आज सब बराबर करने पे अमादा हो गया
अपने बचपन की धुप  छाव को भूल कर
आज जवानी का  रोब दिखाके बोला
कल उसका भी बुढ़ापा  है यह न जाना
किसके पास क्या टिका है यह किसने जाना
कल यह हमारा था आज तुम्हारा है परसों किसी और का
ज़रा मरने का इंतज़ार तो करते हम नहीं अपने साथ लिए जाते
बस अपने साथी की यादें  थी तुम्हारे बचपन के मीठी अठखेलियाँ थी
पास पड़ोस था वर्ना इट,पत्थर से प्यार होता तो क्या बात थी
अपना कीमती  समय तुम्हे देने के बजाये कुछ और कमा लेते या घूम लेते
 यह मकान और पैसा तो मरने के बाद भी मिल जाता
अभी न बोलते तो शायद मेरे जीवन के दो चार साल हँसी  ख़ुशी निभ  जाते
अपने जीवन की सार्थक होने पे खुश रहते
आज एक टीस के  साथ जायेंगे परवरिश में कहीं तो कमी रह गयी
भगवन !! यह कमी तुम्हारी परवरिश से हटा दे  .
एक टुकड़े के ही बात थी अपने जिगर के टुकड़े की इच्छा  से कुछ जायदा  नहीं है .

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

श्रृद्धांजलि

रेनू आनंद ,मेरी सहेली हम नवी क्लास से सहेली थी /बहुत ही शांत ,गंभीर और होशियार/  ३० साल की छोटी से उम्र में उसे जाना पड़ा  किसको को कभी यह नहीं बताया की उससे दिल की कोई बीमारी थी /मुझे भी नहीं ,में अपनी  को उसकी अच्छी सहेली मानती थी /डॉक्टर थी वो  हम आखिर बार एक शादी में मिले थे काफी कमजोर लग रही थी पर यह एहसास नहींथा इतना दुःख रखा है उसने अपने अन्दर /उसे पाता था उससे जाना है इसलिए कितने ही  अच्छे रिश्ते छोड़ दिए / आज उसके घर  में मुझे कौन जनता है कौन नहीं यह तो नहीं पाता पर मेरी सच्ची  श्रृद्धांजलि  है तुझे / में उससे फणीश्वर नाथ के नाम से चिढाती  थी / उसकी मासूम हँसी और मुझे मैथ में मदद करना नहीं भूलूंगी /हम ११ में अलग अलग क्लास में चले गए, पर अस्सेम्ब्ली  में मेरे पास वाली लाइन में खड़ी होती थी ...और भी बहुत कुछ सब कल की ही बात लागती  है  ..और भी बहुत कुछ है बोलने के लिए पर सुने वाले तेरे कान  नहीं ......भगवान !आप  को भी अच्छे लोग चाहिए ,मेरी सहेली का ख्याल  रखियेगा /

हम बहुत बड़ी कवियत्री है

हमने  बहुत बड़ी कवियत्री बनाने के ख्वाब में बड़े  जतन
टूटी मेज़ कुर्सी  का आर्डर दे दिया
घर में सिर्फ धोती पहनाने लग गए हाथ में घडी
 खूब बड़ी अलमारी में ढेर  सी किताबें
एक किताब को भी हाथ न लगाया पर करीने से रखी
गपे मरने के शौक से पीछा छुटे तो कुछ पढते
पति हमारे हम पर बहुत  से फिकरे कसते
जिस महफ़िल में जाते अपने सपनो के नोवेल के प्लाट के चर्चा करते
कुछ समय बाद हम ही चर्चा का विषय हो जाते
बड़े बड़े लोगो की जीवनी पढ़  कर किसी का किस्सा किसी को सुना डालते
कुछ कुछ दबी दबी जबान से  कटाक्ष का हिस्सा बन जाते
जोर की एक फटकार दी सहेली ने
सच्चाई से अवगत कराया
नहीं ज़रूरी इतने नाटक बस करो जग हसाई
अपने को पहचान कर सही जगह इस्तेमाल करो
पूरे पसीने से तरबतर  भगवन!ऐसा  सपना किसको न दिखाए /

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

खुशियों के मायने

कुछ कोरी कल्पनो को पनपते देखा है
कुछ अजनबी इच्छाओ को पूरा होते देखा है
कभी रोते हुए हँस भी दिए है
कभी आसुओ  को बिन बात के लुढकाया है
कोरे पन्नो  पे रंग भी भरे है
 बारिश की बूँद को पकड़ने का नाटक किया है
सप्तरिशी माना है हर ७ तारो के समूह को
इन्द्रधनुष के रंगों को बिखरे दिया है
पेड़ पे चढ़ कर आम भी खाए है
गिल्ली और डंडे पे भी हाथ अजमा लिया है
आज बड़े मुश्किल लागती है यह डगर
सब होते हुए भी सुनी है सेहर
खालीपन आ गया जीवनरस खो गया है
मासूमियत छिप गयी है, हँसी रूठ गयी है
बेमतलब .फ़िज़ूल सी लागती है परछायी
क्या लेंगे किसीका अपना सब लुट बेठे है
खुद से बहुत प्यार है और घर का ख्याल  है
इसलिए जी रहे है मर भी गए तो कौन हमे याद करेगा
यह सोच जी नहीं दुखते
अपने कुछ कर्तव्य है  वही पुरे करते जा रहे है
कदर का तो क्या? इच्छा का तो क्या ?मन के मेल का क्या ?
सब कुछ उड़ते मन के हसीन सपने थे आज उड़ गए
हम ठगे से अपनी अर्थी का इंतज़ार करते है
तभी जीवन अपनी तरफ बुला लेता है
जब सच्चाई  का सामना करते है तो खुशियों के मायने मिल जाते है
बहुत से चीजों  के दोषी हो जात्ते है कुछ सवाल करो तो कटघरे में आ जाते है
कौन सी खुशियाँ ढूंढते है ?सब है बस कुछ बात न मानाने पर जीवन से निराश हो जाते है
एसा भी कहीं होत्ता है नादान दिल का धोखा है
जरा नार हटा के देखो यह सब कितने अपने से लगते है

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

वर्ण का वर्णन

मुझे हर जगह से सलाह मिल रही थी की ,काली दाल,चाय,चना सब बंद कर दो/बस  गिरी (सुखा नारियल ), दूध ,केसर,पनीर,दही  बस यहे ही खाना बाकि सब तुम्हारे और आने वाले बच्चे के लिए ख़राब है बहुत ख़राब है / में तो ख़ुशी के कारण पागल थी मेरी ससुराल वाले इतनी परवाह करते है मेरे जसे खुश किस्मत कोई नहीं / जो बोलते सब में ख़ुशी से पालन किये जा रही थी /सोचती थी , क्या हुआ कोई मेरे पास नहीं पर सब मेरा ध्यान तो रखते ही है /
अचानक एक दिन मेरी ननद ने फ़ोन किया कहाँ कोई काली चीज़ मत खाना वर्ना बच्चा काला होगा .....
तब मेरे दिमाग की घंटी बजी ,,अच्छा!! मेरी माँ, मेरी सासु माँ का यह सलाह  क्या थी.. मेरी सबसे पसंदीदा  काली दाल क्यों नहीं खाऊ .......
चलो मान  लो नहीं खायी दाल पर फिर भी काला हुआ तो ,,और होना भी चाहिए माता पिता का रंग नहीं आएगा तो किसका आएगा /वसे भी कौन से एशियन बच्चे गोरे चिटे होत्ते है बाहर पैदा होने से गोरे  का क्या मतलब..यह दुनिया भी न मेरा दिमाग खाली करके रहेगी ..दिल का रंग कोई भी हो पर चमड़ी  से गोरा होना चाहिए अजीब सोच है /
खेर दुनिया वाले मुझे बोलते थे तुम्हारा रंग दबा है (मैंने जान बुझ कर दबाया  है )लड़का देखने में तुम्हारी माँ को ..वसे तुम्हारे भाई बहिन तो गोरे ............अब इसमें भी दिक्कत .....पर मुझे जो एसा नहीं बोलता था उस पर आश्चर्य होता था ..आजकल पार्लर जाओ सब ठीक हो जाता है ..जिस दिन से मेरा रिश्ता हुआ उस दिन के बाद से में सबसे गुणवान सुन्दर सुशील लड़की हो गयी
खेर मैंने आज तक यह सब बात्तें सुनी ही है ...सब  मानी नहीं (कर्म ,भगवान की देना और किस्मत का कोई तोड़ नहीं  है ) मैंने सब खाया जो मन ने चाह जब चाह बस गैस नहीं होंनी चाहिए ../
मेरा बेटा हुआ ..सब खुश थे शायद बहुत खुश थे ...वो मेरे पति के जसा था उनका रंग दबा था ..जो पूछता कैसा   है मेरा जवाब होता-- बिलकुल अपने पापा पे गया है  इनकी कॉपी है जी ..बस फिर तो आवाज़ और शब्द निकलने बंद हो जाते :लोगो के कैसे  पूछे क्या रंग भी इन्ही पे गया है!!(मेरे तो हँसी से बल पड़ जाते )जब लोगो को फोटो भेजी तो जान में जान आई की गोरा है ...मुझे लगा हर बच्चा एसा ही होत्ता है इतना ही पिंक इतना ही मासूम इतना ही प्यारा ,चार दिन के बच्चे  को देख  यह बताना की माँ जैसा  या पिता हम दोनों के लिए बहुत मुश्किल था ..और मैंने  इतनी मेहनत की तो  में यही बोलती मेरे जैसा  है .
एक दिन मेरी माँ से रहा नहीं गया पूछ ही लिया क्या मौसी पे रंग गया है मैंने  कहाँ सब घर वालो के झलक मिलती है मैंने जान बुझ  कर किसी को बताया  ही नहीं..की असल रंग क्या है मैंने देखना चाहती थी कितना फर्क पड़ता है रंग का और कोई ऐसा  जाना नहीं था जिसने किसी न किसी तरह मुझसे यह पुछा  न हो  /
मेरी कोई दुश्मनी या जिद नहीं है रंग या ऐसा पूछने  वालो से, पर सब को सच मानाने का दम रखना चाहिए .
अगर आप बेटा कहते है  तो बोलो बेटा होगा मुझे ख़ुशी होगा क्यों भगवान बनाने की कोशिश करते हो !
 बोलो मनो की गोरा बच्चा होगा तो मेरी शान ज़यादा होगी! पर कोई यह नहीं मानेगा अच्छा तो अच्छा होता ही है ..पर एक बच्चा बुरा हो सकता ही या भद्दा हो सकता यह कसे कोई सोच सकता है मुझे नहीं लगता कोई सोचता है पर शायद सब एहसास करा देते है की तुम  काले हो लेकिन गोरे को भी वो एहसास करते है क्या वो बुरा मानता है !यह एहसास की तुम काले हो साथ में यह भी जोड़ देते है की वसे रंग से फर्क नहीं पड़ता (अच्छा अगर नहीं पड़ता तो आप इतना क्यों बता रहे है रंग के बारे  में ) गुण होंने चाहिए मन साफ़ होना चाहिए (गोरे लोग चलो काले हो जाओ वर्ना तुम्हारा मन काला है ) सोचिये अगर एसा होता तो क्या कभी negro लोग धरती पे होते सब जगह गोरे ही लोगो को रखना चाहिए /
यह एक मानसिकता है जो सोच के खोखले पन का एहसास कराती है  सुन्दर क पाता है वो सुन्दर है, काले को पाता ही वो काला है,  अंधे को पाता है वो अँधा है ,लूले को पाता है वो लूला है, गरीब को पाता है वो गरीब है  सब को सब पाता है किसी को तरह की नहीं अपनाने की ज़रूरत  है
 वसे अब मेरे बेटा का रंग माता पिता से मिलता जुलता है जिसकी मुझे खुशी है सच / मेरे लिए उसके कर्म का गोरा होना ज़यादा ज़रूरी है /
मज़ेदार बात यह की क्या में अपने पोते के लिए ऐसा  ही सोचुगी ? यह तो वक़्त बताएगा अगर में बदली तो अपनी पोस्ट में ज़रूर बताउंगी /

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

जब मेरे पति ने इच्छा जताई

मेरा पति ने एक दिन इच्छा जताई उन्हें एक गाव की लड़की से शादी करनी थी ,यही सोच  कर मुझसे शादी की (में एक पास के कॉलेज में  पढ़ती थी छोटी  सी जगह से थी .)  पर तुम बड़ी जगह भी देख चुकी थी और तुम्हारा रहन सहन  भी शहर जैसा  था तुम्हारी माँ भी काम करती थी इसलिए वो तुम्हे अपडेट रखती थी .....
यह सुन के मेरा दिल थोडा सा टुटा पर ,फिर मुझे लगा ज़रा अपने पति की गाँव की गोरी बनके दिखाया जाये ---
मैंने बोला वसे आज भी आपकी कही हुए कोई बात नहीं टालती ...
जिसने कुछ देखा नहीं होता यहं US  आके ,वो सब भूल जाती ..इतनी बड़ी दुकाने  इतने अच्छे कपडे ...दिमाग ख़राब हो जाता ........... मुझे तो इतनी अक्ल थी की जितनी  बड़ी उतनी महंगी होगी  तुम्हारा बजट गड़बड़ा जाता ......
न वो मेरी तरह पूजा करती न किसी रिवाज़ को मानती , उसको बहाना मिल जाता यहं कुछ नहीं मिलता ; जबकि अब तो  सब कुछ मिलता है .
(में जलन के बाद भी अच्छी तरह से बोल रही थी )
जब किसी दिन तुम आफिस  से आते तो बिकिनी पहने स्व्मिंग पूल में मिलती ..या किसी गोरे के साथ घुमती दिखती ..
किसी दिन आते तो स्विमिंग पूल में कपडे धो कर भर गार्डेन में सुखा देती और तुम्हे पेनाल्टी भरनी पड़ती ./ लकड़ियाँ इकठा करके चूल्हा बनके रोटी बनाती तो पुलिस ले जाती/ घुघट करके भर जाती कभी नहीं हॉस्पिटल या काम से नहीं जा पाती मेरी तरह (जरा तन के बोला ,मैंने ) और हमेशा तुम्हे छुटटी लेनी पड़ती /

यह बोले अरे तुम तो नाराज़ हो गयी में तो मजाक  कर रहा था ..
अरे तो में कहाँ serious  हु  ..में तो बस यही बता रही थी की आजकल गाँव गाँव में टीवी है किसी से कुछ नहीं छिपता  शहर का चस्का  आसानी से लग जाता है और फिर यह तो विदेश है जहाँ लोगो को बस यही लगता है की घुमो-फिरो और मज़े  करो ,किसी को यह नहीं पता की हर चीज़ का यहं दस गुण पैसा देना होता है पढ़े लिखे गवार है ..में भी एसा ही सोचती थी कभी नहीं पता था की बाथरूम भी  साफ़ करना पड़ता है यह  खुद से बाकि घर  के काम भी सब के लिए मशीन खरीदो  चाहे  पैसा हो या न हो/पास के पार्क में जाने पे भी पैसा लगता है /
बेचारे मेरे पति वो मुझसे बस मजाक कर रहे थे मैंने तो रामायण ही खोल डाली पूरी /
यह सब मिलता है पर नाम अलग है उसे समझ ही नहीं आता  क्या लें ?
देखा !!में कितनी समझदार हु (अपने मुह .......)
अच्छा हुआ फ़ोन बज गया वर्ना सच में पता नहीं कितने विचार मेरे मुह और इनके दिमाग को चोट पहुंचाते /

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

महबूब के एक तड़प और इंतज़ार
बहुत तनहा है एक प्यार की हर किसी को आस है
प्यार  तो  मिल  तो  जाता  संभल नहीं पाता
प्यार के नजाकत न पूछिए  पलक से भी महकने वाला 
और फाये सा मनचला मनमाफिक  
बड़ा बड़े महल नहीं  प्यार के मीठी मीठी  थपकी चाहिए 
एक दिन की नहीं बरसो की आस का परिणाम है 
उम्मीद की डोर  है 
मतलबी और जलन का सुरूर 
कभी कभी  तकरार है फिर मनुहार है 
नज़रो की लुकाछिपी है 
गुस्सा होते होते हसी की फुहार है 
जीवन में झंकार  है  प्यार 
प्रिय की फरमाइश पूरी करने की अदा है 
और क्या कहू 
भगवन  का आशीष है प्यार ...................:)




बुधवार, 31 मार्च 2010

दो पल

ज़रा दो पल ठहर  जाते
हम अपने मन की बात तुमको बताते
कितनी चाह थी रोक ले तुम्हे
पर जाने की जल्दी ने
और बेरुखी से हम अन्दर तक सुलग गए
यु तो इन तोफहा  की चाह  नहीं
 इनमे छुपे प्यार को शिदत से महसूस करते है
तुम्हारी गेरहाजारी में अपनी किस्मत पर इतराते  है
एक तुम ही तो हो जो हमारी बचकानी बाते  झेल पाते  हो
कभी अपनी नादानियों पे हम शरमाते है
तुम्हारे आलिंगन  में जितना सुकून है वो धरती के किसे कोने में नहीं है
हमारी गुस्ताखियों को भी तुम माफ़ कर देते हो
तुमसे ही हमारी शान है सिर्फ तुम्हारा ही अरमान है
हर ख़ुशी दे पाए जिसे तुमने चाह है
तुम्हारे प्यार के सामने मेरी हर चीज़ कम है
हम शुक्रगुज़ार है की रब ने तुम्हारे प्यार के लिए हमे चुना
कितने ही लव्ज कहे वो कम है

मोह

आज सब चीजो  से मोह सा भंग हो गया
इतनी सुविधा पाने के लिए जी जान लगायी थी
दोस्तों के साथ जोश से हमेशा एक से रहने की कसम खायी थी 
आज कितने बदल गए हम ,जीवन की आपाधापी में खो गयी वो मटर गस्ती
तेरा मेरे के दरिया में इतना डूब गए हर सामान से लेकर सस्य्रल तक के लोगो को नहीं छोड़ा   
सब के पास सब कुछ : बस नहीं है तो वो नज़रिया
जो कभी हमेशा लुटने के बात करते थे ,आज जोड़ने  की करने लगे है 
 एक अंधी दौड़  में लगे है आज को  सुकून  से जी लो ,
पर इस मन पे नहीं है किसी  का काबू
जलन इर्षा से भर जाता है जब कोई अच्छा सामान  ले आता  है
या promotion का लैटर दिख जाता है
अगर विदेश का ट्रिप लग जाये तो नश्तर  चुभ जाते है
उलटे मंत्र पड़ने को आते है टोने टोटके से नहीं घबराते
हलकी सी छीक आने पर भी लोगो की नज़र का दोष बताते
लोगो की काबिलियत  नहीं  उसका रुतबा देखिये
तन  मन से देशी पर विदेशी की छाया का कमाल
सुट बूट टाई चश्मा के साथ atitudeका कमाल 
चाय में बिस्कुइत डुबो कर नहीं कुतर कर खायेंगे
ऐसे पोलिश लोगो को क्या बुलवायेंगे
इस जमने का नशा ही एसा है अप्प भी कही घूम हो जायेंगे 

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

ख़िताब गृहणी और संतुलन

अपने सब्जी  के स्वाद को बढने के लिए संतुलन
पास पड़ोस के गप्पे न करने की कसक को  सब्जी के साथ भुनाया है
एक दुसरे को पाठ पड़ने के बजाये , बच्चो के पढाया है
सास बहु के षड्यंत्र बुनने के मन न लगा कर  सिलाई  कड़ाई में मन लगया है
किट्टी पार्टी और पार्लर भी जाती हु बच्चो को स्कूल भेज कर
घर के एक कोने कोने को रोज़ साफ कर मन हर सामान को करीने  से लगा कर
अच्छी गृहणी का ख़िताब पाया है
अपनी पहचान को के घर को  बनाया है
इसका आनंद हर कोई नहीं ले पाया है
नारी की सार्थकता के मायने नहीं समझये  जाते
वो घर स्वर्ग होता है जहाँ  नारी का सम्मान होता है
घर की धुरी माँ होत्ती है  वह कभी कमी नहीं होती
दुनियादारी का हिसाब वोही लगा सकती है
धरती को ऐसे ही माँ नहीं कहते //


हर संतुलित करने वाले चीज़ स्त्रीलिंग ही होती है /

मेरा बच्चा मेरे अरमान

एक अस है एक विश्वास  है
मेरा बेटा अच्छा इन्सान बनेगा
हर काम को सम्पुर्ण कर अंजाम देगा
अपने लक्ष्य को पा कर रहेगा
साथ ही  अपनी सभ्यता  और  संस्कृति
का सम्मान करेगा
दूर नहीं कोई राह उसके लिए
सिर्फ चाह तक पहुँचाना है
अभी वो चलना नहीं सिखा
मेरी उम्मीद ने उड़ना  शरू कर दिया
मेरे असंख्य अरमान ने जनम लेना शरू कर दिया //

 लालन पालन समावेश है
प्यार बहुत पर बिगाड़ने  के लिए नहीं
अरमान है पर थोपे के लिये  नहीं
जीवन का पाठ किसने बेठ कर सिखाया  है
हर बच्चा खुद ही समझदार बन कर आया है
कल हम अपने माता पिता को सीख देते थे
आने वाले कल हमे सीख मिलेगी
जीवन ने ही सबको हर कुछ सिखलाया है
पर यह बेकाबू मन को  अरमान बुनने से कौन रोक पाया है  /

बुधवार, 10 मार्च 2010

Date Date

मैंने अपने बेटे को आज Date  लिखना सिखाना चाह

मैंने बोला आज की  Date  लिखो बेटा
बेटा   -में आज Date  पे नहीं गया
में   --अरे, तुझे आज की Date  नहीं पता?
बेटा- मुझे तो रामू ,संजय,कारन,आदित्य और सुमीत की Date पता है
में  -मुझे लगा उनकी जन्मतिथि की बात कर राह है -बेटा आज की Date  लिख तेरी जनम Date  नहीं
बेटा -अरे वो जनम दिन पर तो मैंने इन सब को बुलाया था वो अकेले थोड़ी आते उनके साथ Date  आये थी और उससे मेरा रुतबा बना
में -रुतबा ?कैसा रुतबा ?
बेटा -माँ ,आप  छोड़ो में आप को नहीं समझा सकता
में --अरे तू क्या समझाएगा  में बाता  रही हु अभी तो बस ५ साल का है तू  ,आज की Date  तो लिख नहीं पा राह
बेटा -पापा ,आप  माँ को बोलो
पापा-तुम्हे नहीं पता Date  का मतलब ,गर्ल फ्रेंड के साथ घूमना
में -हाय ! तुम भी बच्चो  के सामने कैसी  बातें करते हो ?
बेटा -माँ ,मुझे यहे सब पता है आप out Date  हो  गयी  हो 

वतन की मिट्टी

अपने  देश  की रंगत का असर अब हुआ है ,जब में अपने वतन की मिट्टी से दूर हुआ हु
अपनी संस्कृति की गहरायी अब समझ आई है, जब परदेश में लोगो ने की बड़ाई है
आज दादी बाबा की त्योहार की रोनक का मतलब  समझ आया है
 मैंने  परदेश में हर  त्योहार  जोर शोर से मनाया  है
माँ बहिन के साथ चौक में कही  वो कथा , भाई के हाथ में राखी  और टिके की बहुत  याद आये
द्वार पर बनायी  अल्पना ,घर पे बने पकवान की महक ,सबको यहं समटने की कोशिश की है
मेरे देश के लोग यह छोड़ के विदेशी रंग में रंगने लगे
यह  अपनी संस्कृति का सम्मान  और दुसरे की संस्कृति से जुड़ना अच्छी  तरह जानते  है
क्यों नहीं यहं की कुछ अच्छाई बंध लू
जल्दी उठने और सोने की आदत को ,अच्छा खाना और मेहनत करने की आदत  को.
  अपने शारीर का सम्मान करने , सबको एक नज़र और  प्यार से बोलने की आदत को गले लगा लू .
रिश्तो  की पारदर्शिता को ,काम में ईमानदारी को ,हर काम खुद करने के मज़बूरी या चाहत को
 पता नहीं सब बुरी आदत क्यों अपनाते ज़रा देखे क्या है सचाई है
युही नहीं मेरे देश की बड़ाई है यहे माँ जनम दिया है अब परदेश में पल रहे है
कुछ तो फ़र्ज़ और क़र्ज़ का सम्बन्ध हो यही सोच हम चल रहे  है

मंगलवार, 9 मार्च 2010

America

America में  रहना  है  असं  नहीं
 कभी बिमा  कभी कस्टम ने वाट लगाये
रोज़ नए नए काएदे  आये
घुमने की सोचते ही बड़े  बड़े  टिकेट के पैसे याद आते
सबको बस यहं के डालर  नज़र आते, क्यों नहीं उनको यहं के बिल थमते
कोई जगह नहीं दुनिया में जहाँ मेहनत  के बिना कुछ मिल जाता
मेरा पति सुबह जा कर  शाम को आता
१0 से ज़यादा  बिल दे दे कर आधी  तनख्व गवाता
आधी देश भिजवाता
दूर देश सब आस लगे पैसे शायद बक्से में भर लाते
 नहीं समझ आता की जितना पैसा उतनी महगाई
ज़रा सी चोट से आधे महीने  की  पगार गवई
कोई नहीं कहने को मेरा
अकेलेपन  के दर्द से उबार न पाई
सब को बस चकाचोंध  है दिखती
पीछे की  तन्हाई कोई नहीं समझ  पाए
अपने ही लोग करे परायी मेरा बच्चे परदेश में है 
बस बक्से भर पैसे देते जाये और यहं कभी न आये
हम यह बोल के रोब जामये अपने सामान की बड़ी बड़ी लिस्ट भिजवाए //
इसी बहाने हम भी घूम आये
अपना देश अपने लोग पराये लगते है
पराया देश अपना सा लगता है

शून्य हो जाती हु

शून्य हो जाती हु 
अपार खुशी के मिलने पर
असीम दुःख की परछायी से
 अपलावित सपनो के बिखरने  पर
 अबूझ जीवन की पहेली को सुलझाने के लिए
कभी अपने अस्तित्व को बचने  के लिए
यह  मेरे जीवन का संतुलन बना देता
मेरी परिधि का निर्धरण कर मुझे संबल देता
यह शून्य एक घेरा सा हो जा है
अपनी खुशियाँ की संभावना तलाशने में
दुःख की गांठे कम हो जाती
अँधेरे से उजाले की और खीच ले जाता
असंख्य काँटों को परिभाषित कर जीवन का पाठ पढ़ा जाता यह शून्य

सोमवार, 8 मार्च 2010

अगर तुम समझे होते

मेरी मोहबत  को अगर तुम समझे होते
तो यु न दर किनार किया होता 
मेरी आँखों की गहरायी  में तुम्हारा अक्स को जाना होता
कभी एक प्यार की नज़र से देखा होता
माना तुमने बहुत गम का  दरिया देखा है
एक बार मेरे मन को पढ़ा  के देखा होता
तुम्हारे हर दुःख को लेना चाहती हु
एक मौका तो दिया होता
अगर निराश करती तो अपना मुख  न दिखाती 
कभी कभी कोई मिलता है  दुनिया में
जिससे मन मिल पाता  है
बेगाना होता तो क्यों अपना मन लगता
और भी बहुत काम है इस दुनिया में मोहबत के सिवाय
सनम हम भी तुमसे  है बहुत सतये

बुधवार, 3 मार्च 2010

कुछ शब्द

ख़ामोशी में शब्द  की तलाश में गोते खा रहा होता है यह  मन
कभी कुछ शब्द कम पड़ जाते है कभी एक लव्ज़ सब कह देता है
कुछ भवर में फसे पुराने शब्द का मायने समझता है
 खो गए है कुछ लव्ज़ को ढूंढ़ कर रख जाता है
कभी बरबस दो आंसू लुढक जाते है
कभी एक शब्द से जुडी याद ताज़ा हो आती है
कभी न रुकने वाली जबान ,कान के लिए तरस जाती है
कभी कान एक जबान के लिए
खुद से बात करने का पागलपन करवा देता है शब्द का सेलाब
यह ख़ामोशी  भी अपनी सी लगने लगती है

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

I cook with love that give i a taste
I clean to give a good atmosphere
I bond each member by communicating
I am piller and balance the home
I dominate to keep all in place
I listen to make them smile
I spread love to get some
I shout to maintain discipline
 I am doing it because I love to do it
I forget my career, I left my independence
I leave my sleep .I give break
I did it as I am mother
But I get most the most importnt ting
I am satisfied
The life I gave to my child
I support I gave my patner 
The way I handle my family
The way I balance my life
I thank God fo the life he has given to me

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

प्यार की परिभाषा

१४ फरवरी के लिए

प्रेम के रस में डूबा यह संसार है
सिर्फ नज़र चार नहीं
दिल का रास्ता भी साफ़ हो तभी इकरार है /

सिर्फ हमेशा तोहफे देना या लेना ही नहीं
कभी एक प्यार का हाथ
कुछ बातें सुनते हुए कान भी चाहिए /

भरोसा और हर बुराई अच्छाई अपनाई  जाती है
एक दिन का रिश्ता नहीं जनम का होता है
आज तुम कल की और का फंडा नहीं होता /

काम,बच्चो और परिवार पे भी अधिकार होता है
 कभी वक़्त नहीं दे पाते /

ताजमहल नहीं एक शांति और सुकून की जगह 
 दोनों  को समझने की चाह कुछ दिल से करने का जज्बा
कहने से पहले  समझ जाना /

हमेशा सोना चाँदी, हीरा नहीं
साथ में खाना ,घूमना ,खुश  रहना
एक दुसरे के लिए सम्मान
कुछ एसा करने की चाहत /

 जो कभी न किया
हर घटिया से लेकर  बढ़िया चीज़ के मज़े
एक दुसरे से लड़ने नोक झोक से प्यार तक के मज़े /

प्यार एक दिन का नहीं हर दिन का होता है
अगर उस  दिन इज़हार हो जाये तो
दिल बाग बाग हो उठता है /

बंधन और आज़ादी का एक समावेश होता है
घुटन और आवेश का समंदर नहीं  /

माना प्यार की कोई भाषा नहीं होती
एक दुसरे से उम्मीद होती है
कुछ काम कर देना  से प्यार काम नहीं होता
प्यार, प्यार नहीं कर्म होता है /

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

भक्ति में शक्ति

श्रद्धा और आस्था  का साथ 
शांति से किया हुआ पाठ
बिना राग द्वेष के उपवास
आस्था के साथ
पुजन की राह पर
पूजनीय भगवान कभी नहीं निराश करंगे
हर चहा पूरी होगी ,अगर भक्ति में शक्ति होगी
नहीं चाह है भगवान को  चढावा  की, नहीं चहा  फूल की
मंदिर के आंगन में बिखरे फूल की
किसी का चढ़ावा किसी के पाव के धूल
यह है भगवान के मन में शूल
हर चीज़ उसकी बनाई हुई  है
हर कण कण में है व्याप्त है
क्यों किसी ढोंग  या पैसे से टोला  जाता है
जबकि इस जीवन क ढंग से जी लो
ईमानदारी से रिश्ते और जीवन निभालो
बिना लालच और बुराई ,न गरीब न आमिर के
 सिर्फ एक दिन सोच के दिखा दो 
कौन कहता है दुआ ,प्रार्थना काबुल नहीं होती
सच्चे मन से भक्ति की शक्ति तो निभा के देखो /

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

आत्मग्लानी

आज पिताजी की हालत देख कर मेरा मन रो राह है .......कभी  पापा को इतना रोते हुए नहीं देखा .आज इस पड़ाव पर वो अपने आप को रोक नहीं पा रहे है  ..वो अपने आप से लड़ रहे थे किसी बात को मुझे बताना चाहते है ..हालाँकि में उनकी बहुत प्यारी बेटी नहीं हु...... न  ही  उनके बहुत करीब रही पर ......वो मुझ पर बहुत  भरोसा  करते है ..मेरे प्यार को उनके लिए समझने के लिए शब्द की ज़रूरत नहीं है . आज पूरा दिन इंतज़ार कर रही थी....... शायद मुझे बुलाएँगे . और रात को मेरा इतंजार ख़तम हुआ  ...मुझे अपने कमरे में बुलाया और थोड़ी देर अपने आप से अपने विचारो से  लड़ते रहे.. मैंने पिताजी के कंधे पर हाथ रखा और वो एक छोटे बच्चे की तरह बिलख  पड़े ......मैंने  पापा को हमेशा एक बहुत ही मजबूत थोडा गुस्सेल और अपने मन की करने वाले इन्सान की तरह देखा है ..वो कभी अपने आप को कमज़ोर और साधारण नहीं  दिखा पाते थे .......उनके रहने का अंदाज़ किसी महाराजा  की तरह था .पर उनका चिलना और बिना बात के माँ पर हमेशा गुस्सा करना ........मुझे समझ नहीं आता  था..शायद माँ उनको समझ नहीं पाए या वो माँ को या दादा दादी उनके रिश्ते की कड़ी थे या रुकावट यह  में कभी नहीं समझ पाई  ...पिताजी की नौकरी न करने की जिद और हम भाई बहनों का लगातार बढना ....दादाजी की ज़िम्मेदारी बढा राह था पिताजी ने आज तक कभी हम भाई बहनों के सर पे हाथ नहीं रखा न कभी प्यार से देखा हम उनके लिए कुछ नहीं थे / पिताजी  की इतनी दहशत  थी की उनका कोई सामान नहीं छूता  था........ अगर छू दे उनके गुस्से का शिकार होता था ...उनको हमारी पढाई  की कोई चिंता नहीं थी.......... सिर्फ दादाजी के कारण हम लोग पढ़ा  पाए वर्ना आज कहीं गली में घूम रहे होते पर पिताजी बहुत किस्मत वाले थे /उनके पिताजी ने उनकी उनके बच्चे यानि हम लोगो की पूरी जिम्मेदारी  उठा रखी थी / दादाजी के बाद बड़े  भाई  ने बहुत जिमेदारी से सारे  काम किये पिताजी बस अपने  नए  बिसनेस के साथ एक लोन
का बोझ बन गए थे / किसी  बहिन की शादी की चिंता नहीं थी ..पर हम सब बहने सुन्दर थी और पढ़ी  लिखी थी इसलिए हमारी शादी में कोई दिकत नहीं आये ..बस  बड़ी दीदी की देर से हुए बाकि सब की जल्दी जल्दी करवा दी दीदी और भैया ने सब संभल लिया/ पिताजी ने न तो जिम्मेदारी समझी न कुछ  किया बस भरी  महफ़िल में माँ पर चिल्ला  दिए  और हमारे घर को एक बार फिर नीचा दिखना पड़ा ...... वसे हम सब भैये बहनों की नौकरी लगने के बाद .......लोग हमे कुछ पूछते थे वर्ना  कुछ नहीं समझते थे सब डरते  थे.. हम गए तो  उनका कुछ ले न ले .......पर गरीबी के साथ हम सब को बहुत सम्मान दिया था..... भगवान ने कभी किसी की चीज़ पर बुरी नज़र नहीं डाली न ही चाहत तो होती थी/ की पहला चीज़ हमारे पास हो पर कभी उसकी तरफ चुराने  या मागने के बात दिमाग में नहीं आई.......पर एक अजीब से नज़र का सामना करता पड़ता था हमे और यह गलत नहीं पिताजी की वजह से ...पिताजी के करना जो था वो माँ को भी झेलना  पड़ता था वो हमेशा  माँ पर गुस्सा करते रहते थे अगर वो दादी के संरक्षण में नहीं होती तो शायद ...पर माँ इतनी मजबूत नहीं थी उन्होंने  भी उतना प्यार नहीं दिया  बस दादी के प्यार से हम आगे बढे.......... हमेशा कोई न कोई किसे के लिए होता है यह सच है /
शायद इन्सान जाते समय अपने आप अपना लेखा जोखा का हिसाब लगता है आज पिताजी भी लगते है
पिछले १० साल में पिताजी में बहुत बदलाव  आया है  भाभी का आना और खुद किसी के लिए कुछ न कर पाना ..हालाँकि मुझे ऐसा नहीं  लगता की पापा को इस बात का कोई दुःख हो पर अब लग राह है ..वो अपने बच्चो को प्यार करते थे उनको पैदा करके छोड़ दिया ऐसा नहीं था /
मेरे हाथ पकड़ कर बोले "बेटा मैंने कभी किसी  के लिए  कुछ नहीं किया बस अपने लिए जिया और अब मर जाऊंगा........... बिना किसी का भला किये कभी तुम लोगो के  सर पे हाथ नहीं रख...... कभी तुम्हारी पीठ नहीं थप थापयिए ...बाउजी और तुम सब को बहुत दुःख दिया /तुमने मुझे फिर भी एक पिता का दर्ज दिया इसकेलिए मैंने ज़िन्दगी भर तुम्हारा आभार मानुगा हो सके तो मुझे माफ़ करना/ मैंने बहुत खुश किस्मत हु की मुझे तुम्हारे जसे बच्चे मिले और पिता मिले   " मैंने जितना उन्हें शांत करने की कोशिश करी उतने ही बैचेन हो जाते
पर आज उनकी आत्मग्लानी की मायने कुछ नहीं थे... वो अपना दर्द न ले जाये यहे उनके लिए ठीक है ......इसलिए  आज में प्रार्थना  कर रही थी उनका दर्द आंसू और शब्द  में बह जाये और आत्मग्लानी से मुक्त हो /

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

प्यार आता है .

आसान  नहीं है तुमसे दूर रहना
कहीं यह मन लग नहीं पाता
कोई लुभा नहीं पाता
एक लम्हा  सदी  सा  लगता है
 हर जगह तुम्हारी  महक है
हर काम तुम्हारी पसंद का होता है
तुम पर  गर्व होता है
अपनी पसंद पर रोब आता है
बिजली सी सिरहन दोड़ जाती है
एक अनोखा एहसास होता है
तुम पर बहुत प्यार आता है .
जालिम नौकरी ने दूर कर दिया
तुम्हारी   बाहों   में छिपने  को जी चाहता है /

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

मन के दंश

थक गयी हु अपनी तन्हायी से,उब गयी हु अपनी परछायी  से
कभी किसी से शिकवा न किया,आज  उसका खामियाजा मिला
कोई  नहीं है कहने को मेरा
मेरी ख़ामोशी, सब को खुश रखने की कोशिश
पे सवाल उठ खड़ा हुआ
खो गयी हु भीड़ में ज़िन्दगी की आपा  धापी में
अपने निशान छोड़ने की सोच था खुद ही मिट गयी हु
अपने अस्तित्व की तलाश में राह भटक गयी
सब को खुश करने में अपनी साख मिट गयी
आज कुछ हाथ नहीं बस एक बोल सुनाने को मिलता है
तू नहीं तो कोई और होता जो किया सब करते है
सिर्फ मन मसोस कर रह जाती हु
कभी नहीं किया जो चाह था
माँ बाप की  शादी तक की पाबन्दी ,
पति का काबिलियत पे सवाल
मेरी दिल की गहरायी तक हिल गयी इन सब  से
अकेले में सिर्फ आंसू बहा सकती हु किसी को मन के दंश के बारे  में नहीं बता सकती हु
कितनी तनहा हु इस जीवन में
अब सोचती हु बेटा क्या बोलेगा आगे चल कर
एक औरत के भाग्य और विधाता के न्याय के बीच में  हु
कभी अपनी परीक्षा तो कभी अपनी काबिलियत की परीक्षा दे रही हु
सोचती हु जो काबिलियत  की परीक्षा अच्छी होती है वो कौन से दंभ से आगे चलती है
कभी आसमा को चुने का जस्बा रखने वाली में आज ज़मी की सच्ची से दूर भागना चाहती हु
अपनी परछायी को पति  के अक्स में देखने की चाहत अधूरी लिया चली जाना ही होगा .
कुछ कर्त्तव्य के लिए खुद को मिटना ही होगा
सब  और अधुरा है इस दुनिया में अब मेरे लिए बहुत नहीं है यहे गुलिस्ता
शायद मुझे ही अपना पक्ष रखना न आया
इसलिए इस जहन  ने ठुकराया
लड़ा रही हु तन्हायी से एक साथ के लिया
आज उस साथ के बाद भी तनहा हु
कुछ बहुत नहीं माँगा था बस मेरे लिए वक़्त और  थोडा सा प्यार माँगा था
मेरी तमन्ना का सहारा   माँगा था आज मजबूर लाचार की  कतार में खड़ी हु .

हुकूमत

एक जानवर ने भी पलट के देखा , एहसास करा दिया की में खास हु
आज हम सफ़र ने यु  रुसवा किया की जार जार हो गए
महफ़िल की शान से तन्हायी की खान तक का सफ़र बन गए
हर बात को प्यार समझ के निभाते रहे
आज इल्म हुआ यह तो हुकूमत थी
एक चाह रख दी और फरमान जारी हो गया
बिन गुस्ताखी  के गुनहगार हो गए
ता उम्र सजायाफ्ता हो गए

रविवार, 24 जनवरी 2010

अपनी ढपली अपना राग

शादी से मज़ेदार  कोई लेख  हो ही नहीं सकता इतना मसालेदार होती है यह शादी हर उम्र के लोगो के लिए सदियों तक याद रखने के लिए साथ ही उसमे शामिल लोगो के लिए भी और जिनकी शादी होती है वो तो कभी भूल ही नहीं पाते . अलग  अलग  लोग और उनी अलग अलग सोच  का दायरा और मेरा एक नजरिया .


जैसी   लड़की हो उससे उलटे ही लड़के मिलते है लम्बी लड़की हो तो नाटे , गोरी तो काले होनी ही, काली  हो तो गोरे ,सुन्दरता कुछ नहीं होती बस रंग होता है मेरी लड़की काली तो है पर उसके नाक  नक्श  अच्छे है  चहिये , आजकल प्रोफ़ेस्सिओनल और चल गया है ,नौकरी हो ,स्मार्ट हो ,खूब दहेज़  दे बिना मांगे और वि आई पि शादी करे .चाहिए लड़का सडक छाप  ही क्योंना हो देखने में कितना बुरा क्यों न हो ? हम भी तो बोल सकते है इतना  ही पैसा कमाना चाहिए और मेरी बेटी को इतना हर साल देना ही होगा तब ..........

आज कल यह  अच्छा है लव मेरिज हो तो लड़की वाले कुछ  देते ही नहीं है सब दबा जाते है ....और यदि यह  बोल दो हमे दहेज़ नहीं चाहिए तो बस, फिर तो इंतना बेकार स्वागत करते है एकदम  ..आई आई  टी   /आई आई एम् लड़के की बेकद्री कर देते है / और इन्हें लडको को भूत स्वर होता है  प्रेम का ..एकदम आड़ जाते है इसी लड़की से शादी करेंगे ..इतना पढ़ा  लिखा के मना  भी तो नहीं कर सकते.. लड़का पूरा लड़की के कब्जे में होता है और वो लडको वाला रोब ही चला जाता है इसे अच्छा तो आजकल क्लर्क की शादी होती है इतना आता है हमेशा ....हमारे लड़के तो सारी उम्र नौकरी करते है जो दोनों को छुट्टी मिलती है उसमे बहार जाते घुमने..हम ही उनके यहं जा के मिल आते है पूरा काम खुद करो बहु को तो नौकरी पे जाना है कोई फर्क नहीं ...सब लेना देना बंद  मायके से  कुछ नहीं आता ,और अकड़ते ऐसे है लड़की वाले हमारी लड़की के तो बहुत रिश्ते थे ...देख लो वो दिन दूर नहीं जब लड़का होने पे दुःख होगा

लड़की ने अगर खुद लड़का  पसंद किया तो बड़ा ही सुकून मिलता है हम माता पिता का टेंशन ख़तम हो जाता है . अगर अच्छा तो तेरा और अगर बुरा तो तेरा . नहीं तो आजकल की लड़कियां तलाक़ तो ऐसे बोलती है ..की बस ..
और हमारा दहेज़ का भी टेंशन ख़तम और बेटा तो मेरी बेटी के कब्ज़े में ही है /

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मेरे बच्चे के मुस्कान

मेरे  बच्चे के मुस्कान में मेरा जहन समाया है
 सुबह शाम की घडी को उसके हिसाब से चलाया  है
कभी यह मुस्कान मेरा दिन बना देती कभी गुस्सा काफूर कर देती
मेरी हँसी का हँस कर जवाब देता तो में गद गद हो जाती
 हमेशा खिलता रहे उसका यह  मुख प्यारा
माँ की अपार ममता का मतलब अब समझ आया
हर पल उसको खुश देखने के चाह है
हर माँ के दिल की आवाज़ एक होती है बस उसे सुनाने वाले कान चाहिए
यहे विधान है खुद माँ बन कर ही इस एहसास को जिया  जा सकता है

बुधवार, 20 जनवरी 2010

सफल गृहणी

खो गयी शब्दों के धार,नहीं हो रह अच्छे वार
कोई कविता कहानी या नज़म नहीं बना  पाए
लगता है  recession की मार  मेरी लेखनी ने खायी
या इस उम्र का तकाजा है जिसमे  तजुर्ब तो बढ़ा है लव्ज़  कम हो गए
कलम उठाते ही उठ तो जाती है पर चल नहीं पाती
जब खाली  पन्ना दूर होता है तो दिमाग उम्दा सोच से  कविता बना डालता है
जसे ही पन्ना मिलता है विचार गुम हो जाता है
अजब  पहेली  बन गयी है लेखनी
अरे अब याद आया में कविता पकने रख आई  हु जल्दी ही बन जाएगी
खाने का स्वाद तो बढ़ा गया है अपनी सोच का दायरा सिमट गया है
जीवन की  उलझने इतनी है की अपनी पसंद ही भूल गयी हु
या में एक सफल गृहणी हो गयी हु .

शनिवार, 16 जनवरी 2010

अच्छी उसकी कमाई हो कोई बुरी आदत न पाई हो
घर की कोई जिम्मेवारी न हो
मौज  मस्ती की न मनाई हो
घर के खाने की लत न पाई हो
बच्चो को आया के पास रखने की न मनाई हो
किसी  पराई लड़की पे आंख न उठाई हो
 किट्टी पार्टी और घुमने की आज़ादी हो
जल्दी से आ जाओ कलयुग में ऐसे  लडको की ही सगाई हो

बुधवार, 13 जनवरी 2010

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
नोट -कोई फर्क नहीं पड़ता कोई बहुत  फर्क  पड़ता  पढ़िए .
यदि  मेरी बीवी बिंदी सिंदूर और करवाचौथ का व्रत  नहीं करती तू मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता .
यदि मेरी शादी अच्छे गुण वाली से लड़की हो जो खुबसूरत न भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता .
यदि मेरे पिताजी सारी जायदाद मुझे नाभि दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेर बीवी किसी आर से बात करती है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरे दोस्तों की तनख्वा मुझे जयादा है तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरा आई आई टी या आई आई ऍम में नहीं होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरा दोस्त मेरा भाई अगर यू एस  में है तो कोई फर्क नहीं पड़ता
मेरा  घर और गाड़ी छोटी है तो कोई फर्क नहीं पड़ता

दस्तक

मेरे लव्जों को आवाज़ दो
मेरी आँखों  का नूर बनो
मेरे सपनो को आकार दो
मेरी ज़िन्दगी के पंख बनो
 कभी तो इस नादान दिल को समझो
एक दस्तक तो दो पलक बिछा के खड़े है
  दुःख तो बहुत दिया दुनिया ने
थोड़ी . दवा भी दे दो

रविवार, 10 जनवरी 2010

दुनिया के साथ

आजकल जो हो जाये कम है ....सुधा तेरी लड़की ने तेरे सारे किये धरे पर पानी फेर दिया ...
हाँ जीजी ...
क्या हाँ हु... कर रही है जोर की डांट पिला ...याद दिला वो दिन जब जब अगर तू यहं न लाये होती तो  देखती कैसे ३ बच्चे पालती और कैसे आज अच्छी नौकरी लगाती और .................
अरे जीजी ,है तो मेरी ही बेटी अगर ...
कहे की बेटी... अगर बेटी होती तो ऐसा  काम कभी न करती............उसको बोल अगर तेरी दोनों लड़की और लड़का कल उससे  बोले की जायदाद में हिस्सा दो वर्ना तुम्हारा मकान खाली नहीं करेंगे तो कैसा लगेगा उसको ?
जीजी अगर इतना बोल पाती  तो उसके रूखे व्यव्हार का जवाब न दे देती ..हमेशा में ही फ़ोन करती हु ....में या उसके बापू बीमार होते है तो देखने तक नहीं आती ....इस बीमार बहिन पर भी तरस नहीं आता ...उससे तो बस यहे दिखता है तीनो  भाई के पास बहुत पैसा है एक के पास नहीं हम उन्हें अगर दे भी दे तो क्या हुआ ?मेरे तीनो लडको ने मेरा पैसे से किया है कभी कभी ....पर मेरे बेटा जिसके पास पैसा नहीं उसने शरीर से किया .शायद  आज यहे न होत्ता तो हम इतने बड़े पोस्ट वाले लडको पर बोझ होते  उनके रुतबे के साथ अच्छे नहीं लगते ..और अब तू उसके बच्चे इतना  कमाते  है की  इनसबको देख ले और हमे तो देख ही रहे है सब के लिए इतने मेहेंगे महंगे तोहफे लेट है पर इनका लिहाज़ करते है जबकि यहे अपनी पार्टी में बुलने पर छोटा समझते है आज भी सब का काम करते है पर काम कमाता था बेटा पर पोता ने सर्री कसार पूरी कर दी मुझे और इनका सारा इलाज करता है कोई और थोड़ी पैसा देता है खेर छोड़ो चाँद दिन कट  जाये .........
हाँ सुधा सही बात है सब दुनियादारी जानती है तो  .....बोल दे न अगर दम था तो आती तेरी  बीमारी में देती उतना पैसा जितना बाकि ने दिया ..तब क्यों नहीं दिया हिस्सा महीने के खर्च का हिस्सा दे कहाँ गया .......आज उसे तीनो बच्चे कमा  रहे है लेकिन एक ने तुझे कुछ दिया क्या ?
नहीं जीजी गरीब नानी के लिए थोड़ी कुछ है ...
कहे की  गरीब मत दे एक फूटी कौड़ी उनको कुछ नहीं कर सकते तेरा और कुछ बोले तो कह देना  इतने दिने से  मेरे मकान में रह रहे हो किराया दो .........
अरे जीजी तुम भी इस दुनिया की रीत में रंग गयी हो ..मैं अपने कोख जाने के साथ ऐसा नहीं कर सकती
आरी सुधा तू कुछ नहीं कर सकती चाहेये वो तेरा गला ही क्यों न काट  दे....... तेरी बेटी की मति ही मारी  गयी है सब भुला दिया माँ का किया हुआ ........अच्छा होत्ता २० साल  पहले गाँव में ही सड़ने देती  आज कहीं की न होत्ती वहीँ ससुराल में रहती तो
..अरे जीजी ऐसा न बोलो ...आज दुनिया  के साथ चल रही है मेरी बेटी रिश्तो से ज़यादा पैसे को समझा जाता है वर्ना मेरी तरह हार जाती .... 
भगवान करे उसके बच्चे भी माँ की तरह ही सोचे  तब शायद वो मेरी बहना का दुःख समझे
छोड़ो जीजी उसकी  उसके  साथ ............मेरा तो यही फ़र्ज़  था  हमेशा खुश रह वो ............

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

लेखन का नया फैशन

आजकल लेखन में नया फैशन है अपने जीवन की कहानियों और किस्से  को संसस्मरण के बजाये नोवेल बोलना . अपने जीवन की अन्तरंग बातें और उनसे सीख को एक धागे में रोचक ,मसालेदार तरह से पेश करना . वसे में तो एक बहुत ही गुमनाम लेखिका हु ,पता नहीं अच्छी हु या बुरी ....बस आपने आस पास की गतिविधियों को शब्द दे देती हु जो कभी कुछ   पत्रिका गलती से छाप  देती है  . अब सोच रही हु क्यों न में भी अपना संसस्मरण निकाल दू . बचपन से आने वाले बुढ़ापे  तक का ........यहे अब लगा की लेखन में भी बहुत पैसा है ..थोडा सा प्रोफ़ेस्सिओनल हो जाये तो बस ......किताब ..फिर फिल्म और न जाने क्या क्या ?पर अपना दिल काम और दिमाग ज़यादा इस्तेमाल करना होगा और मार्केटिंग अच्छी करनी होगी ..पूरी  तैयारी  के साथ उतरना होगा जल्दी से जल्दी इससे पहले की ऐसे लेखको की बाढ़ आये ........

रविवार, 3 जनवरी 2010

समझोता

 रामा क्या सोच रही है ?
कुछ नहीं सुनीता ..
बताना ...कुछ दिन से परेशां दिख रही है अरविन्द  से  झगडा हुआ क्या ?
नहीं ..........
नहीं ..फिर क्या हुआ .......
कुछ नहीं समझ नहीं आता ......
क्या ..?
यही की क्या हर पति पत्नी एक दुसरे के पूरक होते है
हाँ होते है
अच्छा तू और वरुण हो ?
हाँ ..
फिर लड़ाई
वो तो सबकी होत्ती है
अच्छा ..
रामा जो पूछना चाहती है वो साफ़ साफ़ पूछ
कुछ नहीं .........
अरे .......वसे पी पत्नी का रिश्ता ही कुछ एसा होता है ..
कैसा..................?
 पल में तोष पल में माशा ...
मतलब............
मतलब यही की दोनों एक दुसरे के साथ सबसे अच्छे और सबसे बुरे होते है ...वो सिर्फ इसलिए क्योंकि २४ घंटे १२ महीन साथ रहते है दोनों एकदूसरे को इतना समझते है की यहे भी पता होता है क्या अच्छा लगता है क्या बुरा ....और जब जैसा  पल आता  है वसे हो जाते है ....
फिर लोग अलग क्यों होते है?
इसलिए ..क्योंकि बहुत बार हर रिश्ते में ऐसे मोड़ आते है जहाँ थोडा चुप रहन होता है या बात को टालना होता है नहीं तो बतंगड़  बन जाता ..........वसे भी यहे बात जगजाहिर है की  पति की इज्ज़त  आप  से और आप की पति से..अलग होने पर सिर्फ इनको फर्क पड़ता है और किसको नहीं न माँ बाप न बही बहिन अगर बच्चे छोटे है तो उन्हें पड़ता है वर्ना किसे को नहीं
सही बात है .......
क्या हाँ में हाँ मिला रही है फिलोस्पेर सी .....कोई प्रॉब्लम हो तो बोल
नहीं कुछ नहीं
वसे भी यहे रिश्ता बहुत नाजुक  होता है ....और पूर्ण तो कोई भी नहीं होता हर जाने का रहने खाने का तरीका अलग होता है ...और फिर दोनों एकदम अलग माहौल से आते है एकदूसरे को समझे में समय तो लगेगा ....
सुनी अरविन्द थोड़े अलग है ...
मतलब ..
वो हमेशा दोस्तों घरवालो इन सब के बारे में सोचते रहते है इनको तवाजो देते है ...........में जो भी बोलती हु वो सुनते ही नहीं है बल्कि उस पर मुझसे बहस करते है ........और वोही काम दूसरा जना  करे तो उसकी बड़ाई करते है ....तू जानती है मैंने शादी से पहेले कभी खाना नहीं बनाया अब मैंने सब बनाती हु और .......
अच्छा भी रामा
पता नहीं कभी तारीफ के दो बोल नहीं फूटे और सब के सामने तो कभी नहीं .........जब हम कहीं और जाते है तो इतनी तारीफ करते है चाहे  कैसा  भी खाना बना हो......जो इन्सान जो काम नहीं कर सकता वो कभी नहीं कर सकता ........पर हमेशा मेरा और मेरे घर वालो  से सम्बंधित  बात पर तो हम लड़ाई से ही  करते है
वो तो सबकी होती है..रामा
 हर बात पर ........
नहीं पर ...अगर दोनों परिवार का स्तर अलग है तो पक्का बड़ी लड़ाई होगी
हाँ सुनी यहे सही है ...
पर रामा अरविन्द बहुत अच्छे है
हाँ बहुत अच्छे है ..पर मेरे साथ उनका व्यव्हार समझ नहीं पाती
क्यों .....?
वो   कभी मुझे मदद नहीं करते जब ज़रूरत होती है ........जसे कोई आने वाल है या आ गया है तो इतना मशगुल  हो जाते है की ..............मैंने बीमार होते हुए भी सारा काम खुद किया है अरविन्द  हाथ तक नहीं लगते यहं तक की खुद खुद के बर्तन तक नहीं रखते जबकि अरविन्द के सारे दोस्त मदद करते है और दूसरो के यहं जाके मदद करवाते है ....कुछ बोलने पर बोलते है में जोरू का गुलाम  नहीं......अगर
 मेरे हाथ का बना सामान रखु तो मजाक बनाते है सब के सामने ...खुद की कोई पसंद नहीं न ही मेरा नोवेल पड़ना ,पेंटिंग करना का कुछ और पसंद है बल्कि हमेशा कमियां निकलते  है...मैंने अरव के होने पर सारा काम किया के अगले दिन से खुद किया सब को दिखने के  लिए छुटी तो  ली पर अगर पानी मांग तो आहा उह करने लगते थे    अरे .......
वोई न वसे मुझे कोई मदद नहीं चाहिए लेकिन ...जब में बीमार हु तो न खुद खाना खाते है न मुझे पूछते है .......कोई टोइलेट साफ़ नहीं कोई वचूम नहीं अपना टेबल तक साफ़ नहीं करते शवे करके इतना गन्दा करते है वाशबेसिन कितनी बार बोला पर इतने जिद है की बस .............साफ़ नहीं करके देते ......दिन भर नाक में हाथ .........छी
हर आदमी ऐसे गंदे  ही होते है
पता नहीं........
नहीं हम लू को सफाई का ज़यादा ख्याल होता है
पर सुनी में यहे नहीं बोलती की यही करो पर समय के साथ बदला ज़रूरत है आर आपके लिए ठीक है तो उसमे अहम्  दिखने की क्या ज़रूरत है .....अप्प सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहते की वो आपकी पत्नी बोल रही है तो यहे गलत है
हाँ तू ठीक  है रामा ........पर शादी एक समझोता होता है यहे माना ले ...तो तेरे लिए काफी असं हो जायेगा सब ....इसमें अगर हर बात को एहमियत देगी तो दिकात तुझे ही होगी .......आज भी हमारा समाज इतना नहीं बड़ा है की यहे सवाल जवाब सेहन कर पाए .....और सबसे बड़ी बात अल होके हम भी खश नहीं रह पते आखिर पति पत्नी का रिश्ता इतना कच्चा भी नहीं होता .....समझोता तो हम माता पिता के घर भी करते ही है .........नहीं तो हर जाना बिल गयेस का बच्चा बनाना चाहता है ........तू एक दिन भी अरविन्द के बिना नहीं रह सकती
हाँ में नहीं रह सकती क्योंकि वो बहुत अच्छा इन्सान है .........
और हो सकता है की अरविन्द को लगता हो तू उसकी आज़ादी में एक रोड़ा है
हाँ होगा ही ................पर करीने से रहने में क्या दिक्कत है क्या गलत है
सब प्यार से करवा और वक़्त के साथ सब होगा ................और अच्छा ही होता है .........वर्ना आज शादी की इतनी ज़रूरत नहीं होती वसे भी अगर आदमी में खाने पीने और आवारा गुण न हो और इस कलयुग में क्या चहिये
सही है सुनी किसी भी बात की परते खोल दो और निष्पक्ष हो जाओ तो कितनी आसान   हो जाती है वर्ना एसा लगता है कितना मुश्किल है  साथ निभाना
फिर तो कोई भी दोस्त सहेली और बहिन कोई नहीं होता सब अलग  अलग होते ...
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.