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रविवार, 20 दिसंबर 2009

दस्तक

दुर्बल  मेरी  काया  नहीं
निर्बल  मेरी  छाया  नहीं
यह  तो चंचल मन है
जिसकी गिरफ्त में रहता यह तन है
ओस की बूँद से ख्वाबो के लिए
अपने अक्स तलाशता है
चंद खुशियों के लिए जीवन  वार  करता है
स्वर्ग की आस में नरक का काम हो  जाता है
क्या पता थोडा पैसा अगले जनम के लिए दाता रखने की  इज़ाज़त दे दे
इस आस में सब जमा करता जाता जाता
जाने के दिन दबे पाव यमराज के संग हो लेता
कसे कहते है सबको जाने के आहट  होती है  ?
एक पल भी गिरिवी  नहीं मिलता
जब उनकी दस्तक होती है .

2 टिप्‍पणियां:

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी रचना है। मन ही तो होता है जिसकी कैद में इंसान रहता है। जीवन दर्शन युक्त रचना। साधुवाद

बालकृष्ण अय्य्रर ने कहा…

एक पल भी गिरिवी नहीं मिलता
जब उनकी दस्तक होती है
अच्छी लाईने है आभार्

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