गुरुवार, 5 नवंबर 2009

रचना

रचना  के  मोह में इतना पड़ जाते है
शब्दों  को हेर फेर  में उलझ जाते है
जस्बातों को पिरो कर
मन हल्का कर लेते है
यह दर्द कभी नहीं छुप पाता
कभी आंसू बन बह जाता
 कभी हसी बन उभर जाता 
लफजो की गहरायी दिल में उतर कर
 कितनो के गुम कर अपना बना लेती है
कभी आशिक के बात बयां करती है
कभी मजनू के दास्ताँ जाता देती है
युही नहीं कोई ग़ालिब का दीवाना  होता
छोटी सी  बात मुक़दर बना जाया करती है
तारीफ नहीं है यह किसी की
बस एक दाद की तलब लगती है
बाकि कलम खुद बा खुद अपना काम कर जाती है
दिल से लिखने वालो को कभी कोई कमी नहीं होती
हर लाफव्ज तराना होत्ता है हर रचना फसाना होती है
हर कोण से देख लो दाद की चाह पूरी होती है .  
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