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गुरुवार, 5 नवंबर 2009

रचना

रचना  के  मोह में इतना पड़ जाते है
शब्दों  को हेर फेर  में उलझ जाते है
जस्बातों को पिरो कर
मन हल्का कर लेते है
यह दर्द कभी नहीं छुप पाता
कभी आंसू बन बह जाता
 कभी हसी बन उभर जाता 
लफजो की गहरायी दिल में उतर कर
 कितनो के गुम कर अपना बना लेती है
कभी आशिक के बात बयां करती है
कभी मजनू के दास्ताँ जाता देती है
युही नहीं कोई ग़ालिब का दीवाना  होता
छोटी सी  बात मुक़दर बना जाया करती है
तारीफ नहीं है यह किसी की
बस एक दाद की तलब लगती है
बाकि कलम खुद बा खुद अपना काम कर जाती है
दिल से लिखने वालो को कभी कोई कमी नहीं होती
हर लाफव्ज तराना होत्ता है हर रचना फसाना होती है
हर कोण से देख लो दाद की चाह पूरी होती है .  

9 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार ने कहा…

बस एक दाद की तलब लगती है
क्या बात है

बन्दा हाजिर है दाद देने के लिए , बहुत अच्छी तरह
शब्दों को पिरोया है आपने

sada ने कहा…

तारीफ नहीं है यह किसी की
बस एक दाद की तलब लगती है
बाकि कलम खुद बा खुद अपना काम कर जाती है

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द वर्णन, बेहतरीन रचना ।

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया!!सुन्दर रचना है।बधाई।

ओम आर्य ने कहा…

सुन्दर है कविता के भाव!

अर्कजेश ने कहा…

दर्द को किसी बहाने से निकालना जरूरी है !

बढिया किन्तु उलझी हुई अभिव्यक्ति !

AlbelaKhatri.com ने कहा…

achha laga

Ritu ने कहा…

bahut se dard ase hote hai jinke bare mein hum bhi nahin jante par jab likhte hai tu wo khud ba khud bahar aa jate hai ..esa mere saath to hotta hai ........jab mein khush hotti hu bahut hi dard bhari kavita ban jati hai .....iss peheli ko aaj tak nahin suljha paye hu :)...thoda ajeeb hai par sach hai

Rohit Jain ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Rohit Jain ने कहा…

Achcha laga yun kavita ka jee jana.........Shukriya

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