गुरुवार, 12 नवंबर 2009

परछायी

कितनी ही तस्वीरो को उकेरा है
कितनी ही बातों से जी बहलाया है
अपना सबकुछ दिया है
सिर्फ एक प्यार के नज़र के लिए
थोड़े से सम्मान के लिए
परिवार की खुशियों के लियो
क्या इस दिन के लिए ?
जब कोई नहीं पास जिसे अपना  दुःख सुना सकू
कोई नहीं जो समझ पाए मेरे दर्द को
हमेशा अकेले चलने की जदुजेहद है
कोई कन्धा नहीं जो सहारा दे सके
कोई नहीं जो पूछे क्या पसंद है
हर नोट पे मन के महल नहीं चाहिए
कभी प्यार  के दो बोल , एक कन्धा बस
किसी को सरोकार नहीं हमारी चाहत से
 बस अपना सिक्का चलना है
 अपनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए हमारी याद आती है
बाकि तो बस जीवन बीतना है किसी तरह
क्या अरमान थे एक सफल जीवन के
क्यों एक आशियाने  की चाहत की थी
 जब तिनका जोड़ना नहीं आता था
हमारी चाहतो पे शक था तो
कभी अपने दिल को टटोला होता
हर गम के लिए हम जिम्मेदार हो गए
एक बार सच्चे दिल से पुछा  तो होता
क्यों यह सब होता है
इतनी  चाहत  के  बाद  भी  शुबहा होता है
किसी  की गलती का खामियाजा  किसी को भुगतना पड़ता है
तन्हाईयो का लम्बा अंतराल है
यह कसा रिश्ता है हम अपने  दिल की बात ज़बा पे न ला पाते
और आप  हर बात गलत समझ बठे  है
शुकर है भगवन का यह हुनर तो दिया
अपने आंसू को भी अमृत समझ के पी जाते है
औरत के बेबसी का दर्द हम ही समझ पाते  है
अपनी बात न रख पाने का दंश  क्या होता है
 न मायका में बोल सकते है न सुसराल में बयां होता है
आपको अपना मन था सो कह दिया
पर हर बात का हर्जाना इतना बड़ा होता है
शायद कभी यह बात समझ पाए
पर जो दूरियां होगी उसके लिए हम नहीं पट्टा पाएंगे .
एक नकाब की ज़िन्दगी तो जी ही जायेंगे
अब खुद को परछायी समझ के यहे जीवन बिताएंगे
एक टिप्पणी भेजें