संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

रविवार, 8 नवंबर 2009

और चाहत नहीं

सभी तमनना बाकी है
सभी अरमान अधूरे है
मेरे दिन नहीं बदलने है
बस अब और चाहत  नहीं


पल पल बिखरते टूटते जीवन में
कोई सँभालने की डोर नहीं
कोई सहारा नहीं कोई साथ नहीं
बस और चाहत नहीं

टूटे कांच सा बिखर गया
कोरे पन्नो की तरह खाली  रह गया
सारे  रंग उड़ गए
बस अब चाहत नहीं

कोई आस नहीं कल से
कोई शिकवा नहीं आज से
फिर  क्यों यहे पल दिखाया
बस अब और चाहत नहीं

कोई नहीं है मेरा गुलिस्ता
कोई नहीं मुझे अपना कहता
कोई संबल नहीं इस जीवन का
बस अब और चाहत नहीं जीने की

5 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

रीतु जी कविता तो सुन्दर है मगर ये निराशा अच्छी नहीं शुभकामनायें

M VERMA ने कहा…

सुन्दर रचना
===

सम्भावनाए अनंत हैं, असीम है आकाश
मन मे जो पैदा हो जाये विश्वास

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

आपकी कविता में गहरा दर्द है। लेकिन जीवन में निराशा से भी क्या होगा? आशा ही जीवन है।
------------------
और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

ऋतू जी आशा भरी कवितायेँ लिखा कीजिये...इतनी उदासी ठीक नहीं...लेकिन रचना बहुत अच्छी है...भावाभिव्यक्ति बेजोड़ है...
नीरज

Ritu ने कहा…

mein hamesha asha bahri kavita likhna chahati h par yhe dard kahan se aata hai nahin samjh pati .............phir mujhe lagta hai sukh skh dono pehlu ko samjhna bahut zaruri hai dukh kabhi bahut bada bhagwan ne diya nahin ...par dard kahna se aata hai yhe nahin pata :)

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.