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बुधवार, 4 नवंबर 2009

शादी

दो  लोगो  के  मिलन की दास्ताँ है शादी
कोई तमाशा  नहीं दो  परिवार का मिलन  है
आपस में प्यार  सम्मान और समर्पण का भाव है
कलयुग का  मजाक हो  गया है यहे रिश्ता
कभी पुराने रिवाज़ का झूठा लबादा है कभी एक दिखावा है
सहूलियत से बदलते नियमो  का आइना है
  दहेज ,नारी का  अपमान -लबादे के   साक्षी है
 कभी माता पिता की जिद है कभी बच्चो की नादानी है
कभी प्रेम और परिवार की अह का टकराव है
कभी झूठ  की बुनियाद है  कभी सच्चाई की मिसाल  है
 अंततः कहलाता तो पवित्र  रिश्ता ही है
दो आत्मा का मिलन
दूषित हो गया यहे रिश्ता --ग्रास कर लिए आज के माडर्न समाज ने
प्रेम समर्पण की जगह ज़रूरत  है ,परिवार की जगह पैसा है
मान मर्यादा के जगह रुतबा है ,आदर की जगह दिखावा है
माता पिता की जगह पार्टी है ,बच्चो की जगह जानवर है
समाधान ,समंजयास  की जगह अलगाव  और बराबरी हो गयी है
जिम्मेदारी की जगह ऑफिस की हो गयी है
 रिश्तो की गर्माहट से  आज़ादी ज़रूरी है
संतोष नहीं राह है सब कुछ हर कीमत पे  पाना होत्ता है
 फिर कोई रिश्ता छुटे या हमसफ़र का साथ
निभाना  नहीं अलगाव आसान है
सीधे जानो का इस्तेमाल है टेड लोगो का जमाना है
सगे रिश्तो में जलन और द्वेष का भाव है
इसलिए त्योहारो के महक खो गयी है
,जीवन का उत्साह ख़तम हो गया  है
हर ज़रूरत पूरी होते हुए भी अधूरापन  है
तनखा बढ़ते  हुए दिल छोटा होत्ता जाता है
आदमी औरत की बहस में दवाई का अम्बर  लग जाता है
 और एकदूसरे को नीचे देखने की चाहत है
पूरक की जगह पूर्ण होने के चाहत जग  उठी है
घर बहार की अनंत लडाई है
 जो संसार के ख़तम होने के साथ ही ख़तम होगी .

4 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

हर ज़रूरत पूरी होते हुए भी अधूरापन है
तनखा बढ़ते हुए दिल छोटा होत्ता जाता है
सही कहा है जिसका जितना बडा रूतबा, जितनी अधिक आय वह उतना ही छोटे दिल का हो जाता है

अजय कुमार झा ने कहा…

रितु जी बातें तो आपने बेहद गहरी कही हैं ..मगर मुझे पता नहीं क्यों कविता वाला भाव नहीं दिखा ..मेरे विचार से तो आप इसे सीधे सीधे लिख जाते तो और भी बढिया लगता ..। लिखती रहिये...

Ritu ने कहा…

Ajay ji mein bilkul sehmat hu apki baat se mujhe kavita nahin vichar bolna chahiye

Suman ने कहा…

nice

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