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शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

मोहभंग

आज १० साल बाद रोनित वही   है उन्ही लोगो के साथ बिलकुल अकेला समय से पहले बूढा  और पूरा समय ऑफिस में रहने वाला ...अजीब इतेफाक है किस्मत का संजीव और रोनित एक साथ काम करते है ...आज पार्टी में देखा ..तो एक बार में ही लग गया.... सब कुछ ख़तम हो गया है ///रोनित के जीवन ने  उसको निचोड़ लिया... क्योंकि वो गीता पाठ भूल गया था .  पार्टी के बाद नलिन और संजीव सो गए मुझे नीद नहीं आ रही थी रोनित का चेहरा घूम राह था ..... तरस  आ राह था और लग राह था ...आज उसका मोहभंग हो गया



जो कुछ भी हुआ उसकी आहट कितने लोगो को थे यह  तो नहीं पाता पर मुझे एक अंदेशा था , और वो हो गयाहर शादी शुदा जोड़े में कुछ कुछ अनबन   तो होती ही रहती है... . पर अनबन यहं तक पहुँच जाये तो कुछ बड़ी कमी हुए है ./// किसी तरफ    से गलतियाँ जयादा हुई  है यह  तो कहना मुश्किल  होत्ता है . ...दोनों ही एक दुसरे पे इल्जाम लगते है .अगर दोनों न भी लगाये ...तो घर वाले लगते है .... किसी  के साथ रह कर उसे दूर जाना इतना असं नहीं होता  ..... ज़िन्दगी के खेल अजीब होते है ,,कभी कुछ कभी कुछ ....आज मेरे साथ यह  होगा यह  नहीं सोचा था .
मुझे रोनित से कोई शिकायत नहीं थी ....न ही उसे मुझसे पर आज सब कहते है हम अलग हो जाये . ...तलाक़ ....में ऐसा  नहीं चाहतीथी ... शायद  रोनित भी नहीं चाहते थे

हम दोनों की सोच में कोई अंतर था जो हमे घुन के तरह खा राह था.. या एक दुसरे को दूर कर राह था या शायद हम एक दुसरे से इतने सच बोलते थे की अपने मन की हर बात बता देते थे जो .........या पता नहीं क्या ?
फिर वो किस्मत के सहारे छोड़ दिया सब कुछ पता नहीं कब तक इस किस्मत का नाटक मेरी ज़िन्दगी में चलेगा
रोनित के मिलने के बाद सोचा था कोई तो ऐसा मिला जो कुछ अपने दम पर कर सकता है ...पर यह  नहीं देख पाई ..... की अपने दम पर सब करने वाले .... मेरी क्या ज़रूरत होगी या शायद रोनित की सोच में सबको खुश  करना तो था....... पर उसको खुद को खुश रखना नहीं आता  था ........लोग उसका फायदा उठाते थे .और उसे लगता था.. वो लोगो को पैसे दे कर उनकी ज़रूरत को पूरा करने पर अपने से बांध  कर रखेगा ......पर न तो लोग बांध पाए... न ही उसकी एक गृहस्थी  बन पाई . सबको  खुश करने के चक्कर  में  अपनी ख़ुशी ही भूल गया
उसे  परोपकार का बहुत पसंद  था अच्छी बात होती  पर पहेले अपना घर वालो का पेट तो भर  लेते फिर करते रहते परोपकार....यह  कलयुग है... यहं ज़बरदस्ती किसी की मदद  करना - मतलब इन्सान दिमाग ठीक नहीं है रोनित भी कुछ इसी तरह के थे अगर कोई बेटी की शादी कर या पढाई  करे या  कोई कारोबार शरू करे जबरदस्ती उसको पैसा  देना चाहते है ....किसी को आती हुए लक्ष्मी ठुकराने का मन थोडी करता है ...न ही इनके पैसे से किसे की गृहस्थी चलती है सब अपनी ज़रूरत  को पूरा करना जानते  है..यही बात में समझा समझा कर हर  गयी पर रोनित को कुछ फर्क नहीं पडा ......यही मुदा हमारे बीच एक अनचाही  दुरी बना देता था ...कभी कभी जायदा अच्छा होना भी नुकसानदायक होता है

   कितनी बार गीता का पाठ याद दिलाया की जब तक ज़रूरत न हो लोगो की मदद मत करो ..उनको अपनी सालहें मत दो ...अपनी और अपने बच्चे की ज़िन्दगी पर ध्यान दो ,अपने माँ पापा को देखो .....पर उसे तो सारे जहाँ की ख़ुशी चाहिए थी .... उसे परदादा के खानदान के लोग भी खुश रखना ज़रूरी था  ...सब खुश रहते थे अपने में कोई पूछता नहीं था... रोनित को ............पर उसे अपनी टंग अड़ने की आदत थी ,उसे तकलीफ थी की लोग  अपने बारे में क्यों सोचते है ?क्यों दुनिया  को खुश नहीं रखते में मानती हु अच्छी  सोच थी पर हमेशा हर जगह काम कर यहे कोई ज़रूरी तो नहीं ....इस दुनिया में आये है तो दुनिया के नियमो का पालन तो करना पड़ेगा
कभी मेरे लिए कोई डेट प्लान नहीं की कोई सुरपरिसे नहीं कोई गिफ्ट नहीं जब तक मांगो नहीं पर दूसरो के लिए सब याद रहता था ,मुझे भी सबकी तरह मानते थे .......पर मेरे लिए कुछ सोच पाए इतना बड़ा दायरा नहीं था. यह  सोच मुझे पसंद नहीं थी ...में नहीं चाहती की मेरे पीछे २४ घंटे घुमो ....पर कभी तो  एहसास करू की में स्पेशल तुम्हारी लाइफ  में

में यह  सब बातें किसे बोलू माँ को बोलती.. तो वो मुझे बोलती तू जायदा सोचती है ,भाई बहिन को जीजाजी इतने पसंद थे और वसे भी सबकी अपनी ज़िन्दगी होती है ....ससुराल वालो ....वो मेरे दिमाग का फितूर बता देते .......
बस खुद में ही घुल सकती थी ..भगवन ने शायद इसी दिन के लिए मजबूत बनके भेजा था की यहे सब सह सकू
दोस्तों की इतनी ज़रूरत थी की एक भी दिन न मिले या फ़ोन पे बात न करे तो रह नहीं पाते  थे .बाकि किसी  से कोई मतलब नहीं ....बीवी है या नहीं है घर में बच्चा  कहाँ  है उसकी पढाई  केसी  चल रही है खाना खाया या नहीं ......कुछ मतलब नहीं था... बाकि के बच्चो की क्लास स्कूल बर्थडे सब याद थे..... पर हम दोनों का कुछ नहीं
नलिन बड़ा हो राह था ..सब समझ राह था उसके लिए यह  सब सह पाना आसान नहीं होत्ता ........इसलिए मुझे अलग होंना सही लगा...... शायद दूर रह कर इनको कुछ समझ में आये ....यही सोच कर मैंने दूसरा कॉलेज ज्वाइन कर लिया ...पर नया खेल शरू हो गया रोनित को खाने की कोई दिकात नहीं थी उसके माता पिता उसके साथ आ  कर  रहने लग गए .......रोज़ फ़ोन आता था .शनिवार रविवार को में चली जाती थी शरू में सब ठीक  हो राह था.... पर धीरे धीरे मैंने देखा माताजी पिताजी हम दोनों को अकेले रहने का टाइम नहीं दे रहे है ....मेरी ननद अपने पति बच्चो  के साथ आ कर रहने लग गयी .........मेरी पूरी गृहस्थी मेरे हाथ से छुट गयी या निकल दी गयी .... एक दो बार रोनित जब मेरे पास आये  तो किसी  न किसी बहाने से उनको वापस बुला  लिया ...
में यह  सब कुछ समझ पाती तब तक देर हो चुकी  थी .......रोनित सब का करते रह गए ..में और नलिन  तो कहीं बहुत पीछे छुट गए थे .....

आज नलिन जो सहमा रहता है अकेलेपन महसूस करता है उसे में चाहकर  भी दूर नहीं कर सकती माँ हु,... पिता चाह  कर भी नहीं बन पाती ....कभी लगता है क्या रोनित को नलिन से भी प्यार नहीं उसकी परवाह नहीं मेरी तो कभी थी ही नहीं ...पर क्या मेरा बच्चे के लिए भी ...?सोचे से भी मन डरता है कभी लगता है दुसरे पिता बना दू  इसके लिए पर अब इस बंधन को निभाना ...और सोच से भी डर  लगता है समझ नहीं आता क्या यहे मेरे साथ हो राह है ....सिर्फ एक बच्चे का मुह देख कर रुक जाती हु..... वर्ना शायद जान दे देती ...इस तरह की नादानी नहीं कर सकती ऊपर वाले को भी मुह दिखाना है .....अपने काम तो करने ही पड़ते है अपने जिम्मेदारी निभानी पड़ती है .....दुनिया में दुनिया के नियम मानने पड़ते है

में  हमेशा अकेले में रोई इसलिए रोनित को लगा में को अलग इन्सान हु .......बाकि सब रोनित के सामने रोते है अपना दुखडा लेके उसकी मदद के लिए आज तक से दिया --क्या है लोगो ने जिम्मेदारी के आलावा ........उसके माँ पिताजी जी ने जो किया उसको उसके पूरी श्रधा के साथ निभाया में पूरा उसका साथ देने की कोशिश की पर ....जो कुछ उनके आने के बाद हुआ वो काफी हद तक उनका डर था  कहीं आगे जा कर में रोनित को बदल न दू ....इसके लिए रोनित की ज़िन्दगी तबाह  कर दी .

आज जब संजीव ने मिलवाया तो रोनित को देखकर  में हैरान थी ... नलिन ११ साल का था संजीव ने अपना बेटा कहन तो वो ...दर्द रोनित की आँखों में में न चाहते हुए आगया .....पढ़  लिया उसकी पीढा सब समझ में आगई पर यह पीढा तो  में जानती थी.... आएगी कभी न कभी पर बहुत समय लगा दिया रोनित ने ........मैंने पूछ लिया हैदराबाद से बंगलुरु कब आये तो बोला ८  साल पहेले यह्नी मेरे जाने के  दो साल भी अपने घर में न रहने दिया लोगो ने .....मेरा मन तरस खा गया और उसके मोहभंग का एहसास करा गया . एक बार फिर  संजीव के पीछे मेरे कदम खुद बा खुद उठ गए ......

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